नयी दिल्ली, 23 जुलाई (वार्ता) ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य रही राजधानी की प्रतिष्ठित संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) ने बुधवार को एक रिपोर्ट में कहा कि कम कार्बन उत्सर्जन वाले तरीकों से विनिर्मित हरित इस्पात और स्वच्छ बिजली को अपनाने पर देश में वाहन उद्योग में कार्बन उत्सर्जन का स्तर काफी हद तक कम हो सकता है।
भारत का वाहन उद्योग कारोबार के हिसाब से विश्व में तीसरे नंबर पर है। सीईईडब्ल्यू की नयी स्वतंत्र अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वच्छ बिजली और कम कार्बन उत्सर्जन वाले स्टील का इस्तेमाल करके 2050 तक अपने उत्पादन उत्सर्जन को 87 प्रतिशत तक कमी ला सकता है। ‘हाउ कैन इंडियाज ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर गो नेट जीरो’ एक्सप्लोरिंग डीकार्बोनाइजेशन पाथवेज’ (भारत के वाहन विनिर्माण क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन के स्तर में शुद्ध वृद्धि शून्य कैसे हो कार्बन उत्सर्जन कम करने की राह की खोज) शीर्षक रिपोर्ट ऐसे समय आयी है जबकि भारत के कई विनिर्माताओं ने बीते दो वर्षों में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों का अपना उत्पादन बढ़ाया है और इसके साथ ही वे उत्सर्जन कटौती के महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी तय कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के इन ऑटो विनिर्माताओं ने कार्बन उत्सजन स्तर में शुद्ध वृद्धि शून्य करने की वैश्विक परिभाषाओं के अनुरूप लक्ष्य की ओर विज्ञान आधारित पहल (एसबीटीआई) के प्रति भी अपनी प्रतिबद्धता जताई है। इसके लिए 2050 तक सभी विनिर्माण श्रृंखला में कार्बन उत्सर्जन कम करने की जरूरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के प्रमुख वाहन विनिर्माताओं के लिए, आपूर्ति श्रृंखला स्वच्छ बनाने से न केवल उत्सर्जन घटेगा; बल्कि उनकी दीर्घकालिक लागत प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ेगी और वे पसंदीदा अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित हो पाएंगे।
सीईईडब्ल्यू का अध्ययन तीन दायरों (स्कोप) में उत्सर्जन का आकलन करता है: वाहन विनिर्माण से होने वाला प्रत्यक्ष उत्सर्जन (स्कोप-1), बिजली उपयोग से होने वाला अप्रत्यक्ष उत्सर्जन (स्कोप-2), और अप-स्ट्रीम सप्लाई चेन का उत्सर्जन (स्कोप-3)। भारतीय ऑटो उद्योग के उत्सर्जन में स्कोप-3 के उत्सर्जन का हिस्सा अभी 83 प्रतिशत से अधिक है, जिसका मुख्य कारण वाहन विनिर्माण में कोयला आधारित स्टील और रबर का इस्तेमाल है।
सीईईडब्ल्यू के सीईओ डॉ. अरुणभा घोष ने कहा,“कम कार्बन उत्सर्जन वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी बने रहने के लिए, हमें न केवल उन वाहनों को, जिन्हें हम चलाते हैं, बल्कि उन्हें बनाने वाली औद्योगिक प्रक्रियाओं को भी डीकार्बोनाइज ( कार्बन उत्सर्जन घटाना ) करना होगा।”
उन्होंने कहा,“वाहन निर्माताओं को देखना होगा कि उनके वाहन कैसे बनते हैं, किससे उनकी फैक्ट्रियां चलती हैं, और उनके आपूर्तिकर्ता स्टील और रबर जैसी प्रमुख सामग्रियों को कैसे बनाते हैं।.. उन्हें अब ग्रीन मटेरियल (कम कार्बन उत्सर्जन वाली प्रक्रिया से निर्मित सामग्री) की मांग बढ़ाने, लागत घटाने और स्वच्छ तकनीकों के इस्तेमाल में तेजी लाने पर ध्यान देना चाहिए ।”

