कांग्रेस को खटक रहा नए नेताओं का न उभर पाना

मालवा- निमाड़ की डायरी
संजय व्यास

नरेंद्र नाहटा, सुभाष सोजतिया जैसे मंत्री देने वाले मंदसौर जिले में कांग्रेस विधान सभा सीट पाने के मामले में काफी वर्षों से पिछड़ रही है. 2018 के चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बावजूद मंदसौर की चार सीटों में एकमात्र सुवासरा सीट हाथ लगी थी. वह भी कांग्रेस में फूटे असंतोष के सुर में विधायक हरदीप सिंह डंग के इस्तीफा दे दिए जाने से गंवा दी थी. भाजपा में शामिल हुए डंग ने उपचुनाव में फिर जीत हांसिल कर सुवासरा सीट भाजपा की झोली में डाल दी और इस तरह मंदसौर जिले में कांग्रेस का सफाया हो गया. 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे जिलाध्यक्ष विपिन जैन ने उलटफेर करते हुए मंदसौर सीट जीत ली थी, उन्होंने यहां जीत की हैट्रिक लगा चुके भाजपा के यशपाल सिंह सिसोदिया को हरा दिया, लेकिन कांग्रेस की उम्मीद गरोठ सीट पर सुभाष सोजतिया हार बैठे.

वहीं मल्हारगढ़, सुवासरा सीट भी भाजपा के खाते में रही. अब कांग्रेस 2028 के चुनाव में जिले की चारों विधान सभा जीत की तैयारी कर रही है पर उसके सामने पार्टी नेताओं की आपसी खींचतान से निपटना बड़ी चुनौती है. कुछ पुराने और साफ छवि के नेताओं ने अपनी अनदेखी से उदासीनता की चादर ओढ़ ली है. दूसरी ओर पार्टी को क्षेत्र प्रभावी व जिताऊ नेताओं का अभाव खटक रहा है. क्षेत्र में कांग्रेस में व्याप्त आपसी गुटबाजी और पूर्व मंत्रियों के वर्चस्व के कारण बीते सालों में नए नेताओं को उभरने का मौका ही नहीं मिल पाया.

राजनीति पर हावी होते तस्कर-माफिया

राजस्थान सीमा से सटा अंचल का मंदसौर जिले में कुछ समय से मादक पदार्थ तस्कर, रेत व भू-माफियाओं के मकडज़ाल में जकड़ चुका है. परोक्षत: ये यहां की राजनीति में भी हावी होते दिखाई दे रहे हैं. परिणामस्वरूप इनके खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई कमजोर पड़ रही है. काले सोने (अफीम) की तस्करी के लिए पूर्व से बदनाम क्षेत्र में उसके सह उत्पादों के साथ इन दिनों अवैध शराब के कारोबार ने भी जोर पकड़ लिया है. नकली ओर जहरीली शराब का कारोबार गांव खेड़ों मे खुलेआम बढ़ता चला जा रहा है. सवाल उठ रहा है कि आखिर किसकी शरण और किसके दम पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती? पुलिस की डायरी में केवल छुटपुट केस दर्ज या मप्र राजस्थान में शराब माफियाओं मे आपसी खींचतान के कारण डोडाचूरा, शराब पकड़े जाने के मामले सामने आते हैं और असली माफिया पर्दे के पीछे खेल जारी रखते हैं.

प्रशासन के लिए राजनीति में ऐसे माफियाओं की बढ़ रही पकड़ के कारण भी अवैध कारोबार पर लगाम लगाना मुश्किल हो रहा है. राजनीतिक दबाव में ईमानदार और सख्त अधिकारियों के ट्रांसफर और उन पर गैर मुनासिब कार्यवाही करना भी आम बात होती जा रही. बताया जाता है कि इन माफियाओं और उनके दलालों का गठजोड़ सभी राजनीतिक दलों के कई नेताओं से है, जो उनके खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करते हैं. क्षेत्र में माफियाओं का आलम यह है कि उन्होंने किसानों के खाद-बीज को भी नहीं छोड़ा है. महंगाई के जमाने मे असली नकली के फेर मे उलझ कर लगातार किसान नकली खाद बीज का उपयोग कर बर्बाद और कर्ज की गर्त में जा रहे हैं.

प्रशासन और आदिवासी विकास परिषद आमने-सामने

अलीराजपुर जिले में जनजातीय कार्य विभाग द्वारा रोटी मेकर मशीनों की खरीद के लिए निकाले गए टेंडर में लगातार संशोधनों और शर्तों में बदलाव के चलते बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. रोटी मेकर मशीन की खरीदी को लेकर प्रशासन और आदिवासी विकास परिषद आमने-सामने आ गए हैं. एक ओर परिषद पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और भ्रष्टाचार पर कार्यवाही के लिए आवाज बुलंद कर रही है, तो दूसरी ओर प्रशासन ने पूरे मामले को सही प्रक्रिया वाला करार दिया है. मप्र आदिवासी विकास परिषद के उपाध्यक्ष और कांग्रेस नेता महेश पटेल ने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, पक्षपात की आशंका और तकनीकी प्रक्रिया के दौरान नियमों के उल्लंघन जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच की मांग की है.

महेश पटेल ने आरोप लगाया कि जनजातीय कार्य विभाग ने सेमी-ऑटोमैटिक रोटी मेकर मशीनों की आपूर्ति के लिए पूर्व घोषित अंतिम तिथि पर तकनीकी बिड की प्रक्रिया पूरी कर ली थी. इसके दो दिन बाद फिर पोर्टल पर संशोधन जारी किया गया, जिसमें फिजिकल डेमो की नई तिथि के साथ पात्रता शर्तों में बदलाव कर ट्रेडर/रिसेलर को भी भागीदारी का मौका दिया गया. पटेल ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि तकनीकी बिड के मूल्यांकन के बाद पात्रता में इस प्रकार का बदलाव पारदर्शिता, ईमानदारी और प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के खिलाफ है तथा यह किसी खास प्रतिभागी को अनुचित लाभ देने के इरादे की ओर इशारा करता है.वहीं, सहायक आयुक्त ने इन आरोपों को गलत बताया है. बहरहाल, जिले में सुशासन और जवाबदेही की मिसाल कायम करने के लिए सभी की निगाहें संभावित जांच और उसके निष्कर्षों पर टिकी हैं.

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