राज्य दर राज्य ‘त्रिभाषा नीति’ क्यों बन रही है सियासत का अखाड़ा? तमिलनाडु के बाद महाराष्ट्र में भी घमासान, क्षेत्रीय अस्मिता और भाषाई पहचान का सवाल

केंद्र की त्रिभाषा नीति पर राज्यों में विरोध तेज़, हिंदी थोपने के आरोप; क्षेत्रीय भाषाओं के वर्चस्व की लड़ाई, शिक्षा नीति और सांस्कृतिक पहचान के बीच टकराव।

नई दिल्ली, 30 जून (नवभारत): भारत की बहुभाषी पहचान का सम्मान करने के उद्देश्य से लाई गई ‘त्रिभाषा नीति’ अब राज्य दर राज्य सियासत की शिकार होती जा रही है। पहले तमिलनाडु और अब महाराष्ट्र, कई राज्य इस नीति को लेकर अपनी आपत्ति जता रहे हैं, जिससे यह केंद्र और राज्यों के बीच भाषाई पहचान और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई का नया अखाड़ा बन गई है।

केंद्रीय शिक्षा नीति में प्रस्तावित त्रिभाषा फॉर्मूला, जिसमें हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भारतीय भाषा (अधिमानतः दक्षिण भारतीय भाषा) तथा गैर-हिंदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाने का प्रावधान है, पर लगातार विवाद हो रहा है। तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहां हिंदी विरोधी भावना ऐतिहासिक रूप से प्रबल रही है, इस नीति को हिंदी थोपने के प्रयास के रूप में देखा जाता है। वहां द्रमुक (DMK) जैसी पार्टियां मुखर रूप से इसका विरोध करती रही हैं, यह दावा करते हुए कि यह तमिल भाषा और संस्कृति पर हमला है। अब, महाराष्ट्र में भी इस नीति को लेकर घमासान शुरू हो गया है। महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर गहरी भावनात्मक पहचान है, और कुछ राजनीतिक दल इसे हिंदी के कथित प्रभुत्व से बचाने के लिए मुखर हो रहे हैं। उनका तर्क है कि त्रिभाषा नीति से मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व कम हो सकता है और हिंदी का अनावश्यक प्रचार हो सकता है, जो उनके भाषाई गौरव के खिलाफ है।

क्षेत्रीय पहचान बनाम राष्ट्रीय एकीकरण: भाषाई राजनीति का जटिल समीकरण

यह विवाद सिर्फ भाषाओं के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय पहचान, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय एकीकरण के जटिल समीकरणों को भी दर्शाता है। राज्यों का तर्क है कि शिक्षा नीति में भाषाओं का चुनाव उनकी स्थानीय आवश्यकताओं और सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप होना चाहिए, न कि केंद्र द्वारा थोपी गई कोई व्यवस्था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी चुनावों में भी एक महत्वपूर्ण हथियार बन सकता है, क्योंकि भाषाई पहचान भारत में एक संवेदनशील विषय रहा है। केंद्र सरकार को जहां राष्ट्रीय एकता के लिए एक साझा भाषा के महत्व पर जोर देना है, वहीं राज्यों को अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करनी है, जिससे यह समस्या एक जटिल राजनीतिक चुनौती बन गई है।

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