जबलपुर: मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन व जस्टिस दिनेश कुमार पालीवाल की युगलपीठ ने लोकायुक्त को भोपाल अंतर्गत गोविंदपुरा संभाग के तहसीलदार दिलीप कुमार चौरसिया की संपत्ति की जांच के निर्देश दिये हैं। साथ ही भोपाल कलेक्टर को भी तहसीलदार के विरुद्ध विभागीय जांच संस्थित कर तीन माह में रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने निर्देशित किया गया है। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि एडीएम व कोर्ट के आदेश के बावजूद कार्रवाई को टालना यह दर्शाता है कि तहसीलदार अतिक्रमणकारियों से मिले हुए हैं। उन्होंने रिश्वत लेकर भ्रष्टाचार किया है। जिस पर लोकायुक्त तहसीलदार की संपत्ति की जांच करे। इसके जरिए यह पता लगाए कि तहसीदार के पास आय से अधिक संपत्ति है या नहीं।
हाईकोर्ट ने इस मामले को महज गोविंदपुरा तहसीलदार तक सीमित न रखते हुए व्यापक करते हुए संपूर्ण प्रदेश के तहसीलदारों के कामकाज में कसावट की आवश्यकता रेखांकित कर दी। इसके अंतर्गत एडीएम के आदेश के बाद हर हाल में 30 दिन के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित करने की व्यवस्था दे दी। दरअसल भोपाल के गोविंदपुरा तहसीलदार दिलीप कुमार चौरसिया को एडीएम और हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना करना भारी पड़ा। तहसीलदार ने अतिक्रमण हटाने के आदेश को आठ महीने तक टाल दिया था। इस रवैये को हाड़े हाथों लेकर हाईकोर्ट ने तहसीलदार दिलीप कुमार चौरसिया से सख्त लहजे में कहा तुम्हें हम उदाहरण बनाएंगे।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने ऐसा आदेश जारी किया जिसका असर अब पूरे प्रदेश के सभी तहसीलदारों पर पड़ेगा। भोपाल के पारस नगर फेज-वन में मोहम्मद अनीस और उनकी पत्नी नसीम रहते हैं। दोनों ने इक्विटल स्माल फाइनेंस बैंक से मकान गिरवी रखकर लोन लिया था। लोन लेने के बाद उन्होंने इसे चुकाने से साफ इनकार कर दिया। बैंक ने यह मामला एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट साउथ भोपाल के पास पहुंचाया। सुनवाई के बाद अधिकारी ने फैसला बैंक के पक्ष में सुनाया। 23 जुलाई 2024 को गोविंदपुरा तहसीलदार दिलीप कुमार चौरसिया को आदेश जारी हुआ।
आदेश में कहा गया कि कब्जा दिलाकर संपत्ति बैंक को सौंप दी जाए। इसके लिए पुलिस सहायता लेने के निर्देश भी दिये गये थे। तहसीलदार ने यह आदेश लगभग आठ महीने तक लंबित रखा। बैंक ने कई बार तहसील कार्यालय में आवेदन जमा किए। पांच मार्च 2025 को तहसीलदार ने महज एक नोटिस जारी किया। कोई कार्रवाई नहीं की गई जिससे बैंक को हाई कोर्ट जाना पड़ा। इसके बाद 14 मई 2025 को बैंक ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने इस मामले में तहसीलदार की भूमिका पर संदेह जताया। कोर्ट ने आशंका जताई कि तहसीलदार अतिक्रमणकारियों से मिले हुए हैं।
न्यायालय ने आदेश दिया कि 23 जून 2025 तक बंधक संपत्ति पर कब्जा दिलाया जाए। तहसीलदार ने इस आदेश को भी नजरअंदाज कर दिया। 23 जून को अगली सुनवाई हुई। इसमें तहसीलदार को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश था। तब भी उन्होंने केवल खानापूर्ति करते हुए एक नोटिस जारी कर दिया। हाईकोर्ट के निर्देश पर हाजिर हुए तहसीलदार ने मांगी माफी, लेकिन कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए सख्ती बरती।
जिसके बाद हाईकोर्ट ने बड़ा आदेश पारित करते हुए कहा कि सरफेसी एक्ट की धारा 14 के तहत सीजेएम और एडीएम द्वारा जारी आदेशों पर तहसीलदारों को हर हाल में 30 दिनों के भीतर कार्रवाई करनी होगी। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उनके विरुद्ध सेवा में लापरवाही के चलते विभागीय जांच की जाएगी। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि इस निर्देश की प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजी जाये, जो इसे सभी कलेक्टरों को भेजेंगे, और प्रत्येक जिला कलेक्टर इसे अपने जिले के सभी तहसीलदारों को प्रेषित करेंगे। इस तरह गोविंदपुरा तहसीलदार दिलीप कुमार चौरसिया की एक गलती ने पूरे प्रदेश के तहसीलदारों की कार्यप्रणाली को हाईकोर्ट की निगरानी में ला खड़ा किया है।
