नयी दिल्ली, 17 जून (वार्ता) भारत में पुरावनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञों ने देश के पूवोत्तर क्षेत्र में एक खास प्रकार के वृक्ष के पत्ते का जीवाश्म प्राप्त किया है, जिससे दक्षिण एशिया में 2.4 करोड़ वर्ष पहले पुष्प-पादप विविधता पर नया प्रकाश पड़ सकता है।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बताया कि लखनऊ के बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के अनुसंधानकर्ताओं के एक दल ने पत्ते के इस जीवाश्म का पता लगाया। यह जीवाश्म कोयले की एक खान में कोयले की गहन परतों के बीच मिला।
वैज्ञानिकों ने उसके रूपात्मक लक्षणों का विश्लेषण किया और शुष्क वनस्पति संग्रह प्रौद्योगिकी पर आधारित तुलना और संकुल विश्लेषण के माध्यम से इस जीवाश्म उनकी पहचान की। यह जीवाश्म असम में माकुम कोलफील्ड में पहले पाये गये पत्तों के जीवाश्म से मिलता-जुलता है।
अध्ययन से यह पता लगता है कि यह पत्ता एक ऐसे आधुनिक वृक्ष का है, जो भारत में अधिक वर्षा वाले पश्चिमी घाट क्षेत्र के वनों में पाया जाता है। इस पौधे को ब्रिटेन के एक वनस्पति वैज्ञानिक के नाम पर नोर्थोपेगिया बेडडोमी कहा जाता है। इस तरह के पौधों को कर्नाटक में अम्बता या उलुगरा और दक्षिण के अन्य राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
यह पौधा अब भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में नहीं मिलता है। यह जीवाश्म उत्तर ओलिगोसीन युग का है और दो करोड़ 40 लाख वर्ष से दो करोड़ 30 लाख वर्ष पुराना माना जा रहा है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि पश्चिमी घाट क्षेत्र में यह पौधा पर्वोत्तर से आया होगा। इससे वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के अध्ययन में भी सहायक होगा।
