गुरुवार को सारी दुनिया ने विश्व पर्यावरण दिवस मनाया.दरअसल,विश्व भर में, और विशेष रूप से भारत में, पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियां विकराल रूप धारण कर चुकी हैं, लेकिन इनके समाधान के लिए सामूहिक इच्छाशक्ति और नवोन्मेषी प्रयास भी उतनी ही तेज़ी से उभर रहे हैं.मौजूदा समय में पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के नुकसान, प्रदूषण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है. बेमौसम बारिश, सूखा, भीषण गर्मी और विनाशकारी तूफान अब इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं, बल्कि एक डरावनी सच्चाई बन चुके हैं.महासागरों का बढ़ता तापमान, प्लास्टिक का बढ़ता अंबार और लुप्त होती प्रजातियां प्रकृति के बिगड़ते संतुलन का स्पष्ट संकेत दे रही हैं.
इन चुनौतियों के संदर्भ में, विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि वे अग्रणी भूमिका निभाएं. उन्होंने औद्योगिक विकास के नाम पर सदियों से पर्यावरण का दोहन किया है, और अब उन्हें वित्तीय सहायता और तकनीकी हस्तांतरण के माध्यम से विकासशील देशों का सहयोग करना होगा. हालांकि, साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों के सिद्धांत पर आधारित यह वैश्विक प्रयास अक्सर राजनीतिक दांव-पेंच और आर्थिक हितों के टकराव में उलझ जाता है, जिससे उनके वादों को निभाने की प्रतिबद्धता पर सवाल उठते हैं.
भारत, एक विकासशील राष्ट्र और एक उदार लोकतंत्र होने के नाते, पर्यावरण की इन चुनौतियों का सामना अग्रिम पंक्ति में कर रहा है.हमारे यहां की स्थितियां एक जटिल मिश्रण है.हमारी विशाल जनसंख्या और तीव्र आर्थिक विकास ऊर्जा और संसाधनों पर भारी दबाव डालता है.वायु और जल प्रदूषण, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में, एक गंभीर समस्या बनी हुई है. प्लास्टिक और अन्य अपशिष्टों का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है, जिससे लैंडफिल और जल निकायों में प्रदूषण बढ़ रहा है. जल संकट और वनों की कटाई अभी भी चिंता का विषय है.इसके अलावा एक उदार लोकतंत्र होने के नाते, भारत में पर्यावरण नीतियों को लागू करने में हितधारकों के टकराव, राजनीतिकरण और अल्पकालिक चुनावी चक्रों के कारण देरी हो सकती है. नियम कड़े होते हुए भी, उनके प्रवर्तन में अक्सर ढिलाई देखी जाती है.
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं, जिनमें 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का संकल्प और 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 50 प्रतिशत तक बढ़ाना शामिल है.भारत सौर और पवन ऊर्जा सहित नवीकरणीय ऊर्जा में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा बाजारों में से एक बन गया है.भारत हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में भी काम कर रहा है.बहरहाल, जहां तक मध्य प्रदेश का सवाल है तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मार्गदर्शन में, राज्य सरकार ने भी पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं, जो स्थानीय स्तर पर इन वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं.
दरअसल, पर्यावरण संतुलन और संरक्षण ऐसा विषय है जो केवल सरकार के भरोसे हल नहीं किया जा सकता,बल्कि हर नागरिक को इसमें योगदान देना होगा. वायु, जल और मृदा प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कड़े नियमों का प्रभावी प्रवर्तन आवश्यक है.प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन को अपनाना अनिवार्य है.दरअसल, पर्यावरण संरक्षण और संतुलन एक सतत प्रक्रिया है, जिसके लिए निरंतर प्रयास, नवाचार और सामूहिक संकल्प की आवश्यकता है. यह केवल हमारी आने वाली पीढिय़ों के लिए नहीं, बल्कि हमारे अपने अस्तित्व के लिए भी अनिवार्य है.
