सिकुड़ रही है पार्वती नदी, घाटों पर रेत माफिया का कब्जा

पर्यावरण विशेष

 हरीश दुबे 

ग्वालियर:महाभारतकालीन ऐतिहासिक पार्वती नदी ग्वालियर जिले में स्थित भितरवार में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। नदी के घाट सिकुड़ रहे हैं। प्रशासन की नाक के नीचे यहां रेत का अवैध उत्खनन किया जा रहा है। नदी में इस कदर प्रदूषित पानी आ रहा है कि पीना और नहाना तो दूर, कपड़े धोने तक के लिए इस पानी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।पार्वती नदी के तट पर ही भगवान शिव का देशभर में प्रसिद्ध धूमेश्वर मंदिर मौजूद है।

गोलेश्ववर महादेव मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। साथ ही पार्वती नदी के बहने से इस क्षेत्र में कई सुंदर घाट है। पर्यटन की दृष्टि से नदी के किनारे पर ही भितरवार में पहाड़ी पर बना किला है, जो बहुत ही खूबसूरत है. दियादह घाट, मां पार्वती वाटरफॉल, लक्ष्मण गढ़ हिल देखने के लिए लोग बाहर से आते हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि पार्वती नदी को बदहाली से मुक्त कराकर जल संरक्षण एवं नदी की सफाई के लिए तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इस नदी के नाला बनने में ज्यादा वक्त नहीं है।

खेदजनक पहलू यह है कि यहां से निर्वाचित होने वाले जनप्रतिनिधि एवं स्थानीय अधिकारी पार्वती नदी की सफाई एवं जल संरक्षण के लिए कागजों पर योजनाएं तो बनाते हैं लेकिन ये योजनाएं जमीन पर साकार नहीं हो पातीं। सरकारी महकमों की लेतलाली एवं लालफीताशाही के चलते ये योजनाएं बहुत जल्द फाइलों के ढेर में दफन हो जाती हैं।
कभी भितरवार के लोगों के लिए जीवनदायिनी कही जाने वाली पार्वती नदी प्रशासन की अनदेखी के कारण अब तो हादसों का सबब बन गई है।क्षेत्र के लुहारी घाट पर रात के समय पार्वती नदी के समीप रेत माफिया द्वारा गड्ढे खोदकर रेत निकाली जाती है। ये लोग गड्ढे खुले छोड़ देते हैं, ऐसी स्थिति में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। इस ओर स्थानीय प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। प्रशासन की कार्रवाई का रेत माफिया में कोई भय नहीं है और रेत से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों रात के समय से बेधड़क निकलती हैं।
रेत माफिया द्वारा जगह-जगह खोदे गए गड्ढों में पानी भर जाता है। इससे लोगों को यह अंदाजा नहीं लग पाता है कि गड्ढे की गहराई कितनी हो सकती है। ऐसी स्थिति में कोई भी हादसा घटित हो सकता है। इसके बावजूद स्थानीय प्रशासन द्वारा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।सिंध नदी पर करीब दो वर्ष पूर्व नदी पार करते समय दो भाई इन गड्ढों में समा गए थे। इसी प्रकार करीब 10 वर्ष पूर्व यहां पर मूर्ति विसर्जन के दौरान चार बच्चियों की गड्ढों में डूबकर मौत हो चुकी है। पार्वती नदी के किनारे आने वाले पलायछा, सिला, नजरपुर, लोहड़ी, धोबट, कैठोंत आदि ऐसे घाट हैं, जहां रेत माफिया द्वारा मशीनों से रात में उत्खनन कर रेत का परिवहन किया जा रहा है।

पार्वती नदी की उत्पत्ति सीहोर ज़िले की विंध्याचल पहाड़ियों पश्चिमी श्रेणियों में घने जंगल से सिद्दीकगंज ग्राम के पास 610 मीटर की ऊँचाई पर होती है। सीहोर ज़िले से यह गुना ज़िले में प्रवेश करती है और फिर राजस्थान में प्रवेश कर बाराँ ज़िले से निकलकर सवाई माधोपुर ज़िले पाली ग्राम के निकट में चम्बल नदी में विलय होती है। इसके मार्ग का लगभग 18 किमी भाग मध्य प्रदेश व राजस्थान की सीमा निर्धारित करता है।
नदी के लिए सात करोड़ कराए हैं मंजूर, फिल्टर लगेगा
मैंने विधायक निर्वाचित होते ही पार्वती नदी के संरक्षण एवं यहां की खूबसूरती को बहाल करने के अभियान को प्राथमिकता पर रखा। नदी में आ रहे गंदे पानी को फिल्टर करने के लिए सात करोड़ रुपए मंजूर कराए हैं। प्रयास है कि इसी सप्ताह कार्यक्रम कर नदी के जल का स्वच्छता अभियान प्रारंभ कर दिया जाए।
मोहन सिंह राठौड़, विधायक, भितरवार

हम नदी में ही जुटे थे, भाजपा ने सरकार ही गिरा दी…
मैने अपनी विधायकी एवं मंत्रित्वकाल के दौरान पार्वती नदी को खनन माफिया एवं अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाया था। कमलनाथ सरकार के समय इस नदी के पुनरोद्धार एवं जल संरक्षण के लिए योजना बनाई गई थी लेकिन भाजपा ने हमारी सरकार गिरा दी, तभी से सरकार और प्रशासन ने पार्वती नदी को अपने हाल पर छोड़ रखा है।
लाखन सिंह यादव, पूर्व मंत्री, मप्र शासन

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