धीरेंद्र धर द्विवेदी
सिंगरौली : कंचन नदी जिले की एक प्रमुख जल तंत्र है। वर्ष 1975 में काचन बांध के निर्माण के बाद यह नदी अपने प्राकृतिक प्रवाह को खोते हुये करीब-करीब विलुप्त हो गई थी। लगभग 42 किलोमीटर में अपने अपवाह में पड़ने वाले गांवों तेंदुआ, फुलवारी टोला, गड़ेरिया, तेलदह, पोड़ी नौगई, चोकरा, गड़हरा देवरी समेत करीब 480 एकड़ में नदी पर अतिक्रमण होने से भू-गर्भीय जल स्तर में व्यापक गिरावट दर्ज की गई। काचन नदी के दुर्दशा को देख कलेक्टर चन्द्रशेखर शुक्ला, जिला पंचायत सीईओ गजेन्द्र सिंह ने कंचन नदी पुनर्जीवन करने का संकल्प लिया और मौजूदा समय में काचन से कंचन नदी का स्वरूप ही बदल गया है।
गौरतलब है कि बैढ़न विकास खण्ड के कं चन नदी पूर्व में प्रमुख नदियों में गिनी जा रही थी। किंतु अतिक्रमण कारियों के चलते नदी धीरे-धीरे सिकुड़कर अपना अस्तित्व खोने लगी थी। लेकिन जिला प्रशासन नदी को पुनर्जीवन देने के लिए बड़ा कदम उठाया और मौजूदा समय में कंचन नदी के जीर्णोधार से आसपास में जल स्तर भी ऊपर उठने लगा है। यहां बताते चले कि जिले के कंचन नदी का उद्गम बैढ़न विकास खण्ड के ग्राम पंचायत तेंदुआ के बदनमाड़ा पहाड़ से है।
करीब दो किलोमीटर के बाद कंचन नदी चटनिहा होकर तीन किलोमीटर प्रवाहित होते हुये भैसादह में एक झरने के रूप में गिरने लगती है। यहां पर मझौली क्षेत्र से आने वाला एक अन्य जल प्रवाह नाला भी इसमें शामिल हो जाता है। भैसादह में करीब 49 साल पूर्व वर्ष 1975 में काचन डेम का निर्माण किया गया था। यह स्थान ग्राम पंचायत बिहरा के फुलवारी टोला में है। जहां गड़ेरिया और आगे तेलदह होकर प्रवाहित होते हुये देवरा नगर निगम क्षेत्र सिंगरौल के म्यार नदी में विलय हो जाता है।
कंचन नदी पर सैकड़ों लोगो का कब्जा
जानकारी के अनुसार काचन नदी में कुछ ज्वलंत समस्याएं हैं। जिन्हें माना जा रहा है कि प्राकृतिक प्रवाह अवरु बांध बनने के बाद नदी का जलप्रवाह रुक गया। जिससे इसकी स्वच्छता और बहाव क्षमता खत्म हो गई। नदी के सूख जाने के बाद उसके तल पर स्थानीय निवासियों द्वारा सैकड़ों एकड़ भूमि पर अतिक्रमण कर लिया गया। भूजल स्तर में गिरावट। कृषि और जीवनयापन पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ा।
कंचन नदी के पुनर्जीवन की आवश्यकता क्यों पड़ी
बताया जाता है कि नदी केवल जल का स्रोत नहीं, वरन आसपास के जैविक जीवन का आधार होती है। कंचन नदी का पुनर्जीवन स्थानीय जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन को पुन: स्थापित करने में सहायक होगा। बहती हुई नदी वर्षाजल को धरती के भीतर पहुंचाने में सहायता करती है। इससे आसपास के कुएँ, हैंडपंप और बोरवेल पुन: जल से भर सकेंगे। पुनर्जीवित नदी सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराएगी। जिससे उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी। साथ ही नदी पुनर्जीवन एक सामुदायिक अभियान है, जिससे स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ती है और जल के प्रति उनकी जिम्मेदारी भी विकसित होती है।
कंचन नदी पुनर्जीवन का व्यापक उद्देश्य
कंचन नदी को उसके मूल प्राकृतिक स्वरूप में लौटाना एवं सदानीरा बनाना। अवैध रेत उत्खनन, अनाधिकृत अतिक्रमण के स्थान पर समुदाय सहभागिता आधारित प्रणाली द्वारा नदी के जल का समुचित उपयोग सुनिश्चित करना। तटीय भूमि पर राइपेरियन जोन की स्थापना जल तंत्र को पुन: सक्रिय करना। पर्यावरणीय एवं सामाजिक संतुलन को बहाल करना।
इनका कहना
कंचन नदी पुनर्जीवन परियोजना जनसहभागिता, तकनीकी समन्वय और सामूहिक प्रयासों का जल संरक्षण एवं संवर्धन का अद्वितीय उदाहरण है। कंचन नमन पुस्तक इस प्रयास की प्रेरणादायी दास्तान है। मैं जिले की 9 नदी पुनर्जीवन परियोजना से जुड़े सभी ग्रामीणों, विभागों व संगठनों को हार्दिक बधाई देता हूँ और उनके योगदान की सराहना करता हूँ।
चन्द्रशेखर शुक्ला
कलेक्टर सिंगरौली
इनका कहना
कंचन नदी पुनर्जीवन परियोजना पर विगत 2 वर्षों से कार्य किया जा रहा है। विगत 8 जून 2024 को जल गंगा संवर्धन अभियान के दौरान इस कार्य में अभूतपूर्व गति आई, जिसमें प्रशासन, आमजन और विभागों ने एकजुट होकर कार्य किया और नदी को सदानीरा बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कंचन नमन पुस्तक उन पलों और परिश्रम को सहेजने का सशक्त माध्यम है। मनरेगा तथा जिला खनिज प्रतिष्ठान के उपलब्ध बजट से हुआ यह कार्य जल संरक्षण और संवर्धन की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकेगा।
गजेन्द्र सिंह
मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत सिंगरौली
