यूएनओ के जरिए पीओके लेगा भारत !

केंद्रीय रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में चेंबर ऑफ कॉमर्स के एक कार्यक्रम में जो वक्तव्य दिया, वह कोई सामान्य राजनीतिक उद्घोषणा नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति और वैश्विक राजनय की एक गूढ़ परत का सार्वजनिक प्रकटीकरण है. उनका कथन कि “पाक अधिकृत कश्मीर भारत में शामिल होकर रहेगा केवल भू-राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि एक नैतिक, ऐतिहासिक और वैधानिक संकल्पना है, जो अब निर्णायक धरातल पर आ रही है.1947-48 में जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने भारत में विलय के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर किए, उसी क्षण समूचा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया. लेकिन इस समय पाकिस्तानी सेना ने कबीलाइयों के भेष में हमला कर दिया. भारत ने विश्व के मान्य राजनयन को सम्मान देते हुए मामला संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर रेफर कर दिया. संयुक्त राष्ट्र संघ 77 वर्षों के बाद भी भारत के साथ अन्याय कर रहा है और पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत के पक्ष में फैसला करने में आना-कानी कर रहा है.

दरअसल, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने इस वैध और विधिसम्मत विलय को आधिकारिक रूप से स्वीकारने से अधिक भारत के धैर्य की परीक्षा ही ली है. भारत ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना के तथा बुद्ध, महावीर, गांधी और श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं के अनुरूप—हर बार वैश्विक मंचों पर नैतिक मर्यादा का पालन किया, लेकिन दुर्भाग्य से, इस संतुलन और संयम को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कमजोरी समझा गया.

अब यदि संयुक्त राष्ट्र संघ सिंधु जल समझौते के प्रावधानों को लेकर भारत-पाक के बीच कोई भूमिका निभाना चाहता है, तो उसे स्मरण रखना चाहिए कि कश्मीर का मामला उससे भी प्राथमिक और प्राचीन है. इस संदर्भ में रक्षा मंत्री का वक्तव्य संयुक्त राष्ट्र को एक स्पष्ट संदेश है—जल विवाद से पहले भू-विवाद सुलझाओ. यह चेतावनी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था को उसकी खोई हुई जवाबदेही की याद दिलाने जैसा है.

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को आज विश्व राजनीति के सबसे प्रभावशाली और रणनीतिक विदेश मंत्रियों में गिना जाता है. उन्होंने अपने कार्यकाल में अमेरिका से लेकर रूस, यूरोप से लेकर अफ्रीका तक भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और दृष्टिकोण का जिस स्पष्टता से वैश्वीकरण किया है, वह अभूतपूर्व है.

दरअसल, भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है. हमें पीओके चाहिए, लेकिन हम उसे वैश्विक नियमों के अंतर्गत और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वैधानिकता के साथ लेंगे. यही भारत की परिपक्वता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर को लेकर समय-समय पर जो संकेत दिए हैं, वे केवल सांकेतिक नहीं, बल्कि नीतिगत दिशा-सूचक हैं. बालाकोट, अनुच्छेद 370 का उन्मूलन, और अब पीओके पर स्पष्टता—यह सब उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसे भारत ‘नए विश्व क्रम में नई भूमिका’ के रूप में गढ़ रहा है. भारत अब केवल वैश्विक जनमत का सहभागी नहीं, बल्कि जनमत निर्माता बनना चाहता है.यह संघर्ष केवल सीमाओं का नहीं है. यह धर्म और अधर्म के बीच का है. जहां धर्म का अर्थ सत्य, न्याय और कर्तव्यबोध है. श्रीमद्भगवद्गीता के उस श्लोक की तरह—

सिद्धिं समगम्य योगस्थ: कुरु कर्माणि।अर्थात भारत ने सात दशकों से योगस्थ रहकर कर्म किया है. अब सिद्धि समय की मांग है.

कुल मिलाकर, भारत हमारी महापराक्रमी सेना के बल पर महज कुछ घंटों में पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर ले सकता है, लेकिन भारत सैन्य शक्ति केवल नहीं, बल्कि कूटनीतिक ताकत के बल पर पीओके लेना चाहता है. यही राजनाथ सिंह के बयान का सार्थक और दूरगामी अर्थ निकाला जाना चाहिए.

 

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