धार्मिक जुलूसों पर रोक क्यों नहीं ? प्रशासन क्यों कर रहा कोर्ट के आदेश की अनदेखी

इंदौर: शहर में यातायात जाम होना अब सामान्य बात हो गई है. यहीं कारण है कि जनता परेशान होकर रेंगती रहती है और प्रशासन मूक दर्शक बने हुए देखता रहता है. इसका बड़ा कारण शहर के मध्य मुख्य मार्गो पर निकलने वाले धार्मिक जुलूस, यात्राएं और बारात. प्रशासन जुलूस निकालने की अनुमति कोर्ट की मनाही के बाद भी देता है. सवाल उठता है कि अवैध रूप से जुलूस निकाल रहे है तो कारवाई क्यों नहीं करता? जिम्मेदार पर कारवाई क्यों नहीं होती है?

हाईकोर्ट ने शहर के प्रमुख मार्ग खास कर एमजी रोड, जवाहर मार्ग और आरएनटी मार्ग सहित कई सड़को पर जुलूस, प्रदर्शन और धार्मिक यात्रा निकालने पर प्रतिबंध लगाया था. यह प्रतिबंध आज भी लागू है, लेकिन प्रशासन और पुलिस हाईकोर्ट के आदेश पालन करना उचित नहीं समझते है.पिछले एक माह में शहर में अलग अलग समाजों, धार्मिक संगठनों के साथ राजनीतिक दलों ने प्रदर्शन, जुलूस निकाले. इनमें सबसे ज्यादा धार्मिक जुलूस निकाले गए, जो अलग अलग समाजों के थे. ज्यादातर जुलूस राजबाड़ा, जवाहर मार्ग, एमजी रोड एसडी ही निकाले गए है अथवा निकाले जाते है.

शहर में निकलने वाले धार्मिक जुलूस और यात्राओं के कारण शहर के ट्रैफिक का कचूमर निकल जाता है. घंटों वाहन चालक परेशान होकर रेंगते रहते है. खास बात जो देखने आती है कि जाम को खुलवाने और व्यवस्थित करने में ना पुलिस, ना नगर निगम और ना प्रशासन कोई सुध लेता है. कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है कि धार्मिक जुलूस और यात्राओं के कार्यकर्ता तटकड़ल परिस्थितियों में खुद को शहर का बाप समझते हैं. वाहन चालकों से ऐसा व्यवहार करते है, जैसे वो सड़क और शहर के मालिक हो. होते वो छुटबैये ही.
बुद्धिजीवी हो जाते हैं परोपकारी
पर्यावरण सुधार की बात करने वाले बुद्धिजीवी भी इस दौरान विरोध की जगह परोपकारी हो जाते है, जो आए दिन मीडिया में अपने को समाजसेवी और शहर का सबसे बड़ा हितकारी और ज्ञानी होना बताते फिरते है. ट्रैफिक जाम के दौरान गाड़ियों का धुएं से होने वाले प्रदूषण की किसी को चिंता नहीं होती है. इस दौरान परेशान वाहन चालक की कोई नहीं सोचता है, बल्कि धार्मिक संगठनों के प्रमुख दर्शाते है कि अपनी यात्रा और जुलूस में भीड़ ने कमाल कर दिया. सबसे बड़ी बात यह है कि उक्त जुलूस को सत्ताधारी दल का संरक्षण मिला रहता है. जुलूस निकालने वाले नेताओं के यात्रा और धार्मिक कार्यक्रम में मौजूदगी से फूले नहीं समाते है.

पुलिस कमिश्निरी व्यवस्था के बाद जुलूस और यात्रा की अनुमति क्षेत्रीय एसीपी द्वारा जारी की जाती है. कोर्ट के आदेश का अनुमति जारी करने दौरान हवाला देकर इतिश्री मान लेते है. पुलिस अनुमति नहीं दे, तो फिर सत्ताधारी दल के दादा, भैया, नेता का टेका लगाकर अनुमति ली जाती है. कई जुलूस ऐसे होते है कि यातायात और थाने की पुलिस, उल्टी धार्मिक जुलूस और यात्राओं व्यवस्था संचालित करते नजर आते है. कहने का तात्पर्य यह है कि हाई कोर्ट के आदेश का पालन प्रशासन द्वारा नहीं किया जा रहा है. शहर की जनता और वाहन चालक राजनीतिक संरक्षण के चलते कमजोर मूक दर्शक प्रशासन के सामने बेबस और मजबूर है.

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