जबलपुर: गर्मी का मौसम और ऊपर से प्रबंधन की लापरवाही..ऐसे में कैसे आमजनों के साथ मरीजों की जान सुरक्षित रहेगी। जी हां… हम बात कर रहे शहर के अधिकांश निजी अस्पतालों की जो कि फायदे के लिए संचालित तो हो रहे हैं लेकिन नियमों को ताक पर रखकर और खुद का खर्च ज्यादा वहन न हो उसको ध्यान में रखकर… नतीजा ये होता है कि आग लगने की वजह से कोई बड़ी अग्नि दुर्घटना किसी अस्पताल में घटित होती है तो उस पर फायर सेफ्टी सिस्टम से उस कदर काबू नहीं पाया जा सकता है जिससे जनहानि टल सके।
फायर सेफ्टी सिस्टम के जानकारों की माने तो ऑटोमिशन फायर सेफ्टी सिस्टम में सारी फायर सेफ्टी उपलब्ध रहती है लेकिन अधिक बजट के कारण होटल, अस्पताल संचालकों द्वारा इसे लगवाना उचित नहीं समझा जाता है। जिससे होटल, अस्पतालों में मौजूद लोगों की जनहानि की आशंका अग्रि दुर्घटना के दौरान बढ़ जाती है। इससे ये तो स्पष्ट है कि होटल, अस्पताल संचालकों को अग्रि दुर्घटनाओं के खतरे का किसी प्रकार का कोई भय नहीं हैं। उनका फायर सेफ्टी बिजनेस करने वालों से यही कहना रहता है कि आप तो कम से कम खर्च वाले उपकरण लगाईए कौन सा हमारे यहां आग लग रही है।
शहर के फायर सेफ्टी सिस्टम के सोनू बड़गैयां सहित अन्य फायर संचालकों ने नवभारत को बताया कि शहर के कुछ ही होटल व अस्पताल हैं जिनमें ऑटोमिशन फायर सेफ्टी सिस्टम लगा हुआ है क्योंकि उनके संचालक समझदार हैं और उन्हें लोगों की जान प्यारी है। लेकिन शहर के अधिकांश निजी अस्पताल संचालकों की इस सिस्टम में रूचि नहीं होती है क्योंकि इसका बजट अधिक होता है।
जब इसे लगाने की बात होती है तो संचालकों को फायर सेफ्टी का बिजनेस करने वालों से कहना होता है कि आग कौन सा हमारे यहां लग रही है आप तो कम से कम बजट वाला फायर सेफ्टी उपकरण हमारे यहां लगा दो क्योंकि जिला प्रशासन का आदेश आया है।इस बीच कलेक्टर दीपक सक्सेना ने अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दे दिए हैं कि शहर के सभी निजी अस्पताल की जांच करके रिपोर्ट बनाई जाए और कहां कौन से फायर उपकरणों की कमी है बताई जाए। इस निर्देश में ये भी स्पष्ट किया गया है कि कहीं कोई भी संचालक के अस्पताल में कमी पाई जाती है तो उसका अस्पताल नियमों के अनुरूप हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा।
