एमएसीटी और श्रम न्यायालयों को मुआवजे की राशि सीधे दावेदारों के बैंक खातों में जमा करने का सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों (एमएसीटी) और श्रम न्यायालयों को मंगलवार को निर्देश दिया कि वे मुआवजे की राशि सीधे दावेदारों के बैंक खातों में जमा करें।

न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ ने स्वत: संज्ञान मामले में ऐतिहासिक आदेश पारित किया और कहा कि बड़ी मात्रा में मुआवज़ा बिना दावे के पड़ा होना परेशान करने वाला है। पीठ ने कहा, “इस स्वत: संज्ञान मामले में जो मुद्दा उठ रहा है, वह बहुत चिंताजनक है। यह राशि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 और श्रमिक मुआवज़ा अधिनियम, 1923 के तहत दायर दावों में दावेदारों को दिए गए मुआवज़े को दर्शाती है। दावेदार हालांकि, इन राशियों के हकदार हैं, लेकिन उन्होंने इसे वापस नहीं लिया है।”

शीर्ष अदालत ने गुजरात के सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश बीबी पाठक से प्राप्त पत्र के आधार पर, 2024 में स्वत: संज्ञान मामला शुरू किया था। यह मामला मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण और श्रम न्यायालयों में जमा मुआवजे की राशि के संबंध में दर्ज किया गया था।

शीर्ष न्यायालय ने निर्देशों में कहा कि मुआवजे के अनुदान का अंतरिम या अंतिम आदेश पारित करते समय, एमएसीटी मुआवजा प्राप्त करने के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों से उनके बैंक खाते का विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहेगा।

निर्देश में उच्च न्यायालयों को एक डैशबोर्ड बनाने के लिए कहा गया है, जिस पर मुआवजे की राशि के बारे में जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जानी चाहिए।

पीठ ने कहा, “सभी उच्च न्यायालय 1923 अधिनियम के तहत एमएसी न्यायाधिकरणों और आयुक्तों को प्रशासनिक निर्देश जारी करेंगे कि वे उन व्यक्तियों के ठिकानों का पता लगाने के लिए व्यापक अभियान शुरू करें, जिन्हें मुआवजा पाने का हकदार माना गया है, लेकिन उन्होंने मुआवजा नहीं लिया है। यह जिला और तालुका विधिक सेवा प्राधिकरणों और अर्ध-कानूनी स्वयंसेवकों की सहायता से किया जाएगा।”

शीर्ष अदालत ने दावेदारों को मुआवजा देना सुनिश्चित करने के लिए कई निर्देश जारी किये और कहा कि जब मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण उनके पास मुआवजा राशि जमा करने का आदेश पारित करते हैं, तो उन राशियों को किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा में निवेश करने का निर्देश दिया जाना चाहिए तथा अगले निर्देश तक इसे नवीनीकृत किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि न्यायाधिकरणों के समक्ष आवेदन दाखिल करने के संबंध में कितने राज्यों ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 176 के तहत नियम बनाए हैं। ऐसे नियम बनाए जाने तक न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को व्यवहार निर्देश बनाने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालयों को जल्द से जल्द निर्देशों का क्रियान्वयन करने और 30 जुलाई, 2025 को या उससे पहले इस न्यायालय को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, ताकि यदि आवश्यक हो, तो आगे के निर्देश जारी किए जा सकें।

पीठ ने कहा कि रजिस्ट्रार जनरल अपनी रिपोर्ट में उन राशियों का विवरण देंगे, जो अभी भी बिना भुगतान के पड़ी हैं।

पीठ ने मामले की अनुपालन रिपोर्ट 18 अगस्त, 2025 के लिए निर्धारित करते हुए कहा, “हम यह स्पष्ट करते हैं कि सभी उच्च न्यायालय इस आदेश के तहत निर्देशित उपायों के अतिरिक्त यह सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र हैं कि लंबित राशि दावेदारों तक पहुंचे।”

शीर्ष अदालत ने पाया कि गुजरात में एमएसीटी में 282 करोड़ रुपये से अधिक तथा श्रम न्यायालयों में लगभग 6.61 करोड़ रुपये की भारी राशि बिना दावे के पड़ी है।

एमएसीटी में यह आंकड़ा लगभग 239 करोड़ रुपये तथा उत्तर प्रदेश में श्रम न्यायालयों में 92 करोड़ रुपये है। इसी तरह, पश्चिम बंगाल में एमएसीटीएस में दावा न की गई राशि 2.5 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र में 4.59 करोड़ रुपये और गोवा में 3.61 करोड़ रुपये थी।

 

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