जबलपुर: सत्यापन के दौरान आपराधिक प्रकरण की जानकारी छुपाना नैतिक अधमता है। हाईकोर्ट जस्टिस संजीव सक्सेना तथा जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि याचिकाकर्ता पद के लिए उपयुक्त है या नहीं। नियोक्ता ने अपराधिक प्रकरण दर्ज होने के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी मांगी थी। जिसकी जानकारी दबाना अपने आप में नैतिक अधमता के बराबर है।
अलीगढ उत्तर प्रदेश निवासी राम भुवन यादव की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि ऑर्डिनेंस फैक्ट्री इटारसी द्वारा टर्नर (अर्ध कुशल) के पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। याचिकाकर्ता ने उक्त पद के लिए आवेदन दायर किया था। इसके अलावा 7 और 8 मई 2016 को आयोजित लिखित परीक्षा में शामिल हुआ था। इसके बाद 31 जुलाई 2016 से 7 अगस्त 2016 तथा भोपाल में आयोजित ट्रेड परीक्षा (कौशल परीक्षण) में उपस्थित हुआ था। याचिकाकर्ता लिखित तथा ट्रेड परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ और उसका नाम मेरिट सूची में था।
परिणाम घोषित होने के पश्चात् याचिकाकर्ता द्वारा 25 अक्टूबर 2016 को दस्तावेज तथा सत्यापन प्रपत्र प्रस्तुत किया गया था। सत्यापन प्रपत्र की जांच पर कलेक्टर आजमगढ़ (उ.प्र.) के कार्यालय से रिपोर्ट प्राप्त हुई कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध धारा 354, 323 एवं 325 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आपराधिक प्रकरण पंजीकृत था। जिसमें याचिकाकर्ता को 23 सितम्बर 2016 को दोषमुक्त कर दिया गया। आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के खुलासा याचिकाकर्ता ने अपने सत्यापन पत्रक में नहीं था। आपराधिक प्रकरण चलने के संबंध में पूछे गये प्रश्न का नकारात्मक उत्तर दिया था।
या था। याचिकाकर्ता द्वारा स्पष्टीकरण दिये जाने के बावजूद भी उसकी उम्मीदवारी को रद्द कर दिया गया था। जिनके खिलाफ उसने केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण की शरण ली थी। केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण के द्वारा आवेदन खारिज किये जाने के कारण उक्त याचिका दायर की गयी है। युगल पीठ ने सुनवाई के बाद उक्त आदेश के साथ याचिका को खारिज कर दिया।
