सहकारी विवि की स्वायत्तता सुनिश्चित करना जरूरी: विपक्ष

नयी दिल्ली, 26 मार्च (वार्ता) विपक्षी दलों ने कहा है कि सरकार गुजरात में त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना कर शिक्षण संस्थान के माध्यम से सहकारिता को बढ़ावा देने का प्रयास तो कर रही है, लेकिन इस विश्वविद्यालय की नियुक्तियों में प्रभावशाली लोगों की मनमानी नहीं चले और संस्थान की स्वायत्तता बनी रहे इसको सुनश्चित करने की आवश्यकता है।

कांग्रेस की गनीबेन नगाजी ठाकोर ने लोकसभा में ‘त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक 2025’ पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि सहकारिता आंदोलन सरदार पटेल जैसे नेताओं की देन है, लेकिन इन सहकारी संस्थानों में नेताओं का व्यवहार ऐसा रहता है जैसे यह सरकारी नहीं बल्कि उनकी कंपनी हो। उनका कहना था कि 1946 में सरदार पटेल की सहमति से किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए त्रिभुवन पटेल ने सहकारिता के माध्यम से दुग्ध उत्पादन की शुरुआत की थी और उसी का परिणाम है कि आज देश में आठ लाख से ज्यादा सहकारी संस्थाएं हैं।

उन्होंने कहा कि सहकारिता संस्थाएं आज भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई हैं, लेकिन त्रिभुवन विश्वविद्यालय इससे दूर रहे यह सुनिश्चित होना चाहिए। इसमें नियुक्तियों महिलाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इससे देश में सहकारिता के क्षेत्र में आंदोलन और मजबूत हो यह प्रयास होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि इस संस्था की स्वायत्तता बनी रहे और इसमें नेताओं का दखलंदाजी नहीं चले। उनका कहना था कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने सहकारिता संस्थानों के जरिए किसानों की स्थिति मजबूत करने के लिए काम किया।

श्रीमती ठाकोर ने कहा कि इस विश्विविद्यालय के जरिए किसानों, पशुपालकों को लाभ हो और इसमें किए जाने वाले शोध आदि के जरिए किसानों को तकनीकी लाभ मिले यह उम्मीद की जानी चाहिए, इसलिए सबसे पहले यह तय होना भी जरूरी है कि इसमें योग्य लोग भर्ती हों और किसी भी स्तर पर राजनीतिक भर्ती नहीं हो। उन्होंने कहा कि उनका संसदीय क्षेत्र बनासकांठा एशिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक क्षेत्र है और उन्हें उम्मीद है कि इस संस्थान के खुलने के बाद वहां दुग्धक्रांति को और मजबूती मिलेगी। बनासकांठा का सहकारी संस्थान की अवधारणा और मजबूत हो इसके लिए जरूरी है सहकारिता की संस्थाएं पारदर्शी तरीके से काम करें।

भाजपा के मितेश पटेल ने कहा कि त्रिभुवन दास ने किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए जो आंदोलन किया था उसे 1946 में आणंद में स्वरूप मिला आज पूरी दुनिया में अमूल दूध का परचम लहरा रहा है। त्रिभुवन दास ने किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए आंदोलन किया था और सहकारिता की संकल्पना के जरिए किसानों को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान की। उनका कहना था कि शुरु में अमूल ने हर दिन 250 लीटर से दुग्ध का कारोबार किया लेकिन आज 2.38 लाख लीटर दूध का इस्तेमाल हर दिन किया जा रहा है।

उन्होंने त्रिभुवन दास को युगपुरुष बताया और कहा कि उन्होंने देश में जो श्वैतक्रांति आरंभ की उसका लाभ देश के दुग्ध उत्पादक किसानों को सहकारिता के माध्यम से मिला। सहकारिता ने ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत किया। आजादी के बाद देश में दुग्ध उत्पादन में तकनीकी का इस्तेमाल शुरु हुआ और उसका श्रेय भी अमूल को ही जाता है। उनका कहना था कि सहकारिता की मजबूती के लिए तकनीकि आदि महत्वपूर्ण है और सहकारिता देश के हर किसान के लिए आदर्श है। उन्होंने कहा कि सहकारिता त्रिभुवनदास के व्यापक दृष्टिकोण का परिणाम है जिसका लाभ आज देश के हर किसान को मिल रहा है।

शिवसेना (उद्धव गुट) के अरविंद सावंत ने कहा कि सहकारी विश्वविद्यालय के गठन का स्वागत करते हैं लेकिन आज कल जो भी कुछ होगा वह गुजरात में होगा। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में सहाकरिता आंदोलन लंबे समय से रहा है इसिलए उनके राज्य में विश्वविद्यालय खुलता तो अच्छा होता। इस विश्वविद्याय का कामकाज लोकतांत्रिक तरीके से चलना चाहिए।

शिव सेना के नरेश गणपत म्हस्के ने कहा,“ प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृतेव में सहकारी क्षेत्र मे ऐतिहासिक नींव रखी गई है। सहकारी क्षेत्र को सुधारकर इसे सशक्त बनाया जा रहा है। जहां हमारे समय में सहकार से समृद्धि आ रही है वहीं कांग्रेस के समय सहकारी क्षेत्र भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया था। सहकार के नाम पर कांग्रेस ने भ्रष्टाचार फैलाया लेकिन मोदी सरकार ने देश में समृद्धि का द्वार खोला है।”

कांग्रेस के एम के राघवन ने कहा कि सरकार क्यों इस विधेयक लेकर आई है जबकि इंस्टीट्यूट आफ रुरल मैनेजमेंट आनंद (इरमा) वर्षों से काम कर रही है। इरमा की एक विरासत है। सरकार क्या इरमा के साथ छेड़छाड़ करना चाहती है। इरमा राजनेताओं और नौकरशाह के हस्तक्षेप से दूर रही है। उऩ्होंने कहा कि इस विधेयक से इरमा के निदेशक की शक्ति को कम किया जाएगा। इस मामले में इस विधेयक के प्रारुप के समय इस पर विचार नहीं किया गया।

भाजपा के अरुण गोविल ने कहा कि वास्तव में सहकारिता मंत्रालय की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि सहकारिता आंदोलन कुछ अपवादों को छोड़कर भ्रष्टाचार, अक्षमता , भाई भतीजावाद तथा अशिक्षा के बोझ तले दबा हुआ था। मंत्रालय बनने के बाद सहकारिता आंदोलन में दशकों से चली आ रही कमियों को दूर करने का काम किया गया और देश के भ्रष्ट शक्तियों के दिल में दहशत पैदा हुई।

राष्ट्रीय जनता दल के अभय कुमार सिन्हा ने कहा कि बिहार में पैक्स और सहकारी समितियां ग्रामीण इलाकों मजबूत बना रही है लेकिन फिर बिहार में एक भी प्रमुख सहकारी शिक्षा अनुसंधान संस्थान नहीं है वहीं गुजरात में इरमा को पहले से ही प्रतिष्ठित संस्थान माना जाता है उसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाता है। उऩ्होंने कहा कि कहा जाता है कि बिहार में डबल इंजन की सरकार है जिसमें बिहार का इंजन बंद पड़ा पड़ा है और दिल्ली का इंजन गुजरात की तरफ भाग रहा है। उन्होंने कहा कि बिहार मे सहकारिता के बिस्कोमान का चुनाव अधर में लटका है उसे कराया जाना चाहिए।

समाजवादी पार्टी के आदित्य यादव ने कहा कि सरकार को उत्तर प्रदेश में सहकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना करती तो राज्य में सहकारिता क्षेत्र की चुनौतियों को कम करने का काम किया जाता। सरकार ने पुराने संस्थान पर नया नाम लगाने का काम किया है। सरकार को सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करना था तो वह अलग विश्वविद्यालय बनाती न कि इरमा के स्थान पर सहकारिता विश्वविद्यालय बनाती।

कांग्रेस की कडियम काव्या ने कहा कि तेलंगना में सहकारी क्षेत्र में लगे लोग बहुत समस्याओं का सामना कर रहे है। सरकार को इसका लक्ष्य स्पष्ट किया जाना चाहिए। सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में सहकारी क्षेत्रों को बढावा न दे। सरकार को इस विश्वविद्यालय में पारदर्शी स्थापित करना चाहिए।

भाजपा के गणेश सिंह ने कहा कि यह देश का पहला ऐसा विश्वविद्यालय होगा जो सहकारी शिक्षण औऱ प्रशिक्षण देगा। सहकारी समितियों में तकनीकी जानकारी का आभाव है लेकिन अधिकांश सहकारी समितियां कमजोर हो रही है थी। अब विश्वविद्यालय बनने से सहकारी क्षेत्र में बेहतर काम होने की उम्मीद है।

भाजपा के गणेश सिंह ने कहा कि कई राज्यों में सहकारी समितियां बहुत अच्छा काम कर रहीं हैं। इन समितियों को तकनीकी ज्ञान एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण की जरूरत है। देश में सहकारिता एक जनांदोलन बनता जा रहा है। डेयरी मात्सियिकी आदि क्षेत्रों को भी सहकारिता क्षेत्र में लाया जा रहा है। इस सहकारिता विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित कार्यबल मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के आर सच्चिदानंदम ने कहा कि सहकारिता आंदोलन का जन्म दक्षिण भारत में कर्नाटक में हुआ था। इसलिए सरकार को दक्षिण भारत में एक सहकारिता का केन्द्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किया जाना चाहिए।

वाईएसआर कांग्रेस की जी तनुजा रानी ने कहा कि विश्वविद्यालय में क्षमता निर्माण के सभी तरीके उपलब्ध होंगे। इस विधेयक के कुछ प्रावधानों में कुछ संशोधन करने होंगे। अतिकेन्द्रीयकरण से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश में वाई एस जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार ने सहकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया था।

निर्दलीय राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने कहा कि सहकारिता बनने के पीछे छोटे सीमांत किसानों की छोटी खेती को बल देने का विचार था। देश के किसी भी हिस्से में मजदूर से लेकर आईएएस तक बिहार के लोगों ने मेहनत से तस्वीर बदली है। लेकिन बिहार के लोगों को हर जगह मारा जाता है। उन्होंने कहा कि सहकारिता संस्था में तकनीक एवं व्यावसयिक प्रशिक्षण की जरूरत है। आज सहकारिता संस्थाएं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में सहकारिता का काम सबसे कम है। उन्होंने मांग की कि पटना में भी त्रिभुवन सहकारिता विश्वविद्यालय जैसा संस्थान खुलना चाहिए।

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के एम पी अबू समद सामदानी ने कहा कि त्रिभुवन दास पटेल का नाम बहुत प्रासंगिक है। नारायण गुरू ने कहा कि ज्ञान की सीमा त्रिभुवन के परे तक जानी चाहिए। उन्होंने गुजरात की बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया और दुग्ध क्रांति लायी। श्याम बेनेगल की फिल्म मंथन में इस सहकारिता आंदोलन को दर्शाया गया है। उन्होंने कहा कि पूर्वाग्रह प्रेरित रवैये से सरकार को मदद नहीं मिलेगी। इस स्वायत्तशासी संस्थान की स्वायत्तता एवं बहुलतावादी स्वरूप को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। इसे रोका जाना चाहिए।

केरल कांग्रेस के फ्रांसिस जॉर्ज ने कहा कि केरल का सहकारिता क्षेत्र विकेन्द्रित और स्वायत्त है। गुजरात में आणंद दुग्ध सहकारी संस्था एक मॉडल है। लेकिन सरकार ने वित्त विधेयक में कर प्रणाली में एक संशोधन लाकर सहकारिता संस्थाओं पर भारी बोझ डाल दिया है। उन्होंने सरकार ने अपील की कि इस संशोधन को समाप्त करके सहकारिता संस्थाओं को बचाया जाये।

रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के एन के प्रेमचंद्रन ने कहा कि वह इस विधेयक का समर्थन कर रहे हैं। लेकिन कुछ पहलुओं का वह विरोध करते हैं। पेशेवर प्रबंधन और कारपोरेट शासन की कमी, लोकतांत्रिक नियंत्रण की कमी, अत्यधिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक हस्तक्षेप एवं प्रशासनिक नियंत्रण सहकारी संस्थाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। सत्तापक्ष को इस बारे में काम करने और संस्थागत स्वायत्तता की जरूरत है।

कांग्रेस प्रशांत पडोल ने कहा कि सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि यह विश्वविद्यालय कारपोरेट साथियों के लिए काम नहीं करे और वास्तविक उद्देश्य के लिए समर्पित रहे।

भाजपा के जर्नादन मिश्रा ने कहा कि 2023 तक सहकारिता क्षेत्र में 13 प्रतिशत रोज़गार देता था। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक पांच करोड़ लोगों को रोजगार देने का अनुमान है। सहकार शिक्षा समृद्धि के तीन आधारों पर यह विश्वविद्यालय चलेगा। महिलाओं, मछुआरों, पशुपालकों आदि क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय नीतियों का निर्माण करने में योगदान दिया जाएगा। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि किसानों के फर्जी अंगूठे लगा कर कर्ज बांटा गया और वो कर्ज वापस नहीं अदा किया गया। यह सब माफियागिरी से पैसे की लूट की गयी है।

जन सेना पार्टी के बालाशोरी वल्लभनेनी ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि गुजरात ने सहकारिता क्षेत्र में बहुत अच्छा काम किया है। देश में सभी को इसके सबक से सीखना चाहिए।

आम आदमी पार्टी के गुरमीत सिंह मीत हेयर ने कहा कि क्या एक विश्वविद्यालय गुजरात में बनने से देश भर में सहकारिता मजबूत हो जाएगी। उन्होंने कहा कि देश के हर प्रदेश में ऐसे विश्वविद्यालय खोलने और उनके एवं बड़ी सहकारी संस्थाओं के बीच परस्पर सहयोग के करार किये जाने चाहिए।

समाजवादी पार्टी (सपा) के वीरेंद्र सिंह ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि इस विश्वविद्यायल की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि सहकारिता एक मजबूत आंदोलन है और उसकी जड़े देश के हर कोने में मजबूती से काम कर रही हैं। उनका कहना था कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर कुछ सवाल हैं और इन सवालों का जवाब इसी सदन में दिया जाना जरूरी है। त्रिभुवन सहकारिता विश्वविद्यालय किसानों के हित में काम करे यह सुनिश्चित किया जाना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह बताया जाना चाहिए कि इसमें कुलपति की नियुक्ति को लेकर क्या विधान है इसका खुलास भी सदन में ही किया जाना आवश्यक है।

सपा नेता ने सहकारिता के क्षेत्र में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह का स्मरण करते हुए कहा कि उनके कारण सहकारिता को मजबूती मिली है और किसान ऋण के कारण साहूकारों के चुंगुल में रहता था उससे उसको मुक्ति मिली है। उन्होंने सहकारिता को शिक्षा से जोड़ने को महत्वपूर्ण कदम बताया और उम्मीद जताई कि इससे सहकारिता आंदोलन को और मजबूती मिलेगी।

तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय नेक हा कि भले ही त्रिभुवन दास ने सहकारिता को मजबूती प्रदान की हो और देश में श्वेत क्रांति का सूत्रपात किया था लेकिन इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका बर्गिस कोरियन ने निभाई। वह विदेशों में पढे थे और उन्होंने दुग्ध क्षेत्र में पहले से स्थापित क्रांति को तकनीकी रूप देकर नया स्वरूप दिया जिसका किसानों को जबरदस्त लाभ मिला और अमूल पूरी दुनिया में स्थापित हुआ।

उन्होंने कि इस विश्विविद्यालय में कुलपति और निदेशक की नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए और कहा कि इससे पता चलता है कि इस सहकारिता शिक्षण संस्थान में दो शक्ति के केंद्र होंगे। सवाल है कि जब कुलपति ही सबकुछ होता है तो उसमें निदेशक की भूमिका क्या होगी। दो पावर सेंटर बनाकर सरकार क्या संदेश देना चाहती है। उन्होंने कहा कि इसमें सबसे बड़ा मुद्दा इस विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का है और इसमें मुख्य सवाल यह है कि विश्विवद्यालय की स्वायत्तता किस तरह की होगी।

द्रमुक के के ई प्रकाश ने कहा कि तमिलनाडु में भी सहकारिता की परंपरा बहुत मजबूत है। राज्य में 1.61 लाख सहकारी संस्थाएं काम कर रही हैं और बहुत अच्छा काम कर रही हैं। राज्य में सहकारी संस्थाओं के माध्यम से हो रहे दुग्ध उत्पादन को देखें तो यह तमिलनाडु में दुग्धउत्पादन का स्वर्णकाल है। वहां दुग्ध उत्पादक संस्थाएं मजबूत हो रही हैं। उन्होंने त्रिभुवन सहकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर सवाल उठाए और कहा कि इसे खोलने की जरूरत ही क्या थी। तमिलनाडु में सहकारी संस्थाएं उल्लेखनीय काम कर रही हैं और किसानों को मजबूती प्रदान की जा रही है। उनका कहना कि राज्य में किसानों को ब्याजमुक्त ऋण दिया जा रहा है। उनका कहना था कि जो राज्य सहकारिता के क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं उन्हें बढावा दिया जाना चाहिए।

तेलुगु देशम पार्टी के श्रीभरत मुतुकामिल्ली ने कहा कि मोदी सरकार ने छह जुलाई 2021 को सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की थी और देश में सहकारिता से जुड़ी संस्थाओं को मजबूती प्रदान करने की पहल की थी। उसी का परिणाम है कि आणद में आज त्रिभुवन सहकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह देश का पहला सहकारिता विश्वविद्यालय है जिसमें शिक्षण के साथ ही अनुसंधान को महत्व दिया जाएगा जो आने वाले समय में सहकारिता क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।

उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश में सहकारी संस्थाएं अच्छा काम कर रही हैं लेकिन कुछ संस्थाएं अच्छी तरह से अपनी भूमिका नहीं निभा पा रही हैं और उन्हें अपना काम ईमानदारी से करने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। श्री प्रकाश ने कहा कि आंध्र प्रदेश में 17 हजार सहकारी संस्थाएं हैं जिनमें करीब 20 प्रतिशत संस्थाएं अच्छा काम नहीं कर रही हैं।

भाजपा के इटाला राजेन्दर ने चर्चा में शामिल होते हुये कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शक्तिशाली नेतृत्व ने कई क्रांतिकारी कार्य किये हैं। उनके नेतृत्व में सहकारी व्यवस्था को मजबूत करने के लिये जो महती कार्य किये गये हैं, उनके परिणाम सामने आ रहे हैं। देश में एक लाख सहकारी समितियां हैं, जो अलग-अलग क्षेत्र में काम कर रही हैं, इसके 30 करोड़ सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि सहकारी क्षेत्र को ताकत देना, लोगों को जोड़ना स्वागत योग्य कदम है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना से सहकारी क्षेत्र मजबूत होगा, विकास के लिये सहकारी व्यवस्था का आगे बढ़ना जरूरी है।

निर्दलीय विशाल दादा प्रकाश बापू पाटिल ने कहा कि सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना बहुत अच्छा निर्णय है, “बिना सहकार, नहीं उद्धार”। वह विधेयक का समर्थन करते हैं।

समाजवादी पार्टी के छोटे लाल ने चर्चा में शामिल होते हुये कहा कि केवट, बिंद और मछुआरा समुदाय के रोजगार के लिये सहकारी व्यवस्थायें मजबूत की जायें, तो बहुत अच्छा रहेगा। गरीबों, दलितों और आदिवासियों को भी सहकारिता के पूरे लाभ पहुंचाने के प्रयास किये जाने चाहिये।

भाजपा के जयंत कुमार राय ने कहा कि सहकारिता एक राष्ट्रीय मिशन है, सहकारी जीवन को नया स्वरूप देने के लिये यह विधेयक लाया गया है। राष्ट्रीय महत्व के इस संस्थान से सहकारी क्षेत्र को बहुत मजबूती मिलेगी। इस विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले युवा सहकारी क्षेत्र के प्रबंधन में महती योगदान देंगे। वह सभी सदस्यों से आग्रह करते हैं कि वे इस विधेयक का सर्वसम्मति से समर्थन करें।

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