
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ तय आरोप किये निरस्त
जबलपुर। हाईकोर्ट जस्टिस ए के पालीवाल की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि शारीरिक संबंध स्थापित करने के लिए शिकायतकर्ता की मौन स्वीकृति थी। बलात्कार का आरोप गठित करने में भौतिक तत्व होने चाहिये। जिला न्यायालय ने भौतिक तत्वों के बिना प्रकरण में याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय किये। एकलपीठ ने इसे कानून की दृष्टि में गलत मानते हुए तय आरोप को अपास्त करते हुए याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की है।
शहडोल जिले के बुढार निवासी अजय चौधरी की तरफ से दायर पुनरीक्षण याचिका में न्यायालय द्वारा बलात्कार के अपराध में आरोप तय किये जाने को चुनौती दी गयी थी। याचिका में कहा गया था कि प्रेम संबंध होने के कारण दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित हुए थे। विवाह के लिए दोनों पक्ष के लोग तैयार नहीं हुए जिसके कारण शिकायतकर्ता ने उसके खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाई।
याचिकाकर्ता एसईसीएल में गार्ड की नौकरी करता था और शिकायतकर्ता अतिथि शिक्षिका उम्र 24 के संपर्क में साल 2019 में आया था। याचिकाकर्ता मार्च 2020 से फरवरी 2021 तक शिकायतकर्ता के घर कई बार गया और इस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए। इस दौरान शिकायतकर्ता की माँ तथा दादी भी घर में थी। पहली बार शारीरिक संबंध स्थापित होने पर युवती ने इस संबंध में परिजनों को बताया था। इस दौरान याचिकाकर्ता ने शादी करने की बात कही थी।शिकायतकर्ता के माता-पिता मार्च 2021 को विवाह की बात करने याचिकाकर्ता के रिश्तेदारों के घर गये थे। इस दौरान दोनों पक्षों में विवाद हो गया और शिकायतकर्ता के द्वारा अप्रैल 2021 में राजेन्द्र नगर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई थी।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि शिकायतकर्ता ने मनोवैज्ञानिक दबाव में शारीरिक संबंध बनाने की मौन स्वीकृति प्रदान नहीं की थी। शारीरिक संबंध बनाने में मौन स्वीकृति के कारण प्रकरण में बलात्कार का आरोप गठित किये जाने के भौतिक साक्ष्यों का अभाव है।याचिकाकर्ता ने शादी का झूठा प्रलोभन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित नहीं किये। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ याचिकाकर्ता के खिलाफ बलात्कार की धाराओं के तहत तय किये गये आरोप को निरस्त कर दिया।
