जीवन में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बदलाव जरूरी

 

 

फिक्स माइंडसेट को कहें अलविदा

क्या कहा तुमने… मुझे बदलना होगा? लेकिन क्यों?
“मेरे हिसाब से तो मैं बिल्कुल ठीक हूँ! मैं ऐसा ही करती हूँ, कोई आज की बात थोड़े ही है, सालों से यही होता आ रहा है…”

हममें से कितने लोग हैं जो यह वाक्य बार-बार सुनते हैं या खुद भी ऐसा ही सोचते हैं?

असल में, इसान का दिमाग स्वाभाविक रूप से बदलाव से बचता है। उसे जो चीज़ें पहले से पता होती हैं, जो आदतें उसने बचपन से बनाई होती हैं, वह उन्हीं को सही मानता है। बदलाव का मतलब होता है “कंफर्ट ज़ोन से बाहर आना”, और दिमाग को यह पसंद नहीं आता। इसलिए हम अक्सर कहते हैं—”मैं ऐसा ही हूँ,* या फिर “मुझसे यह नहीं होगा!”

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह सोच हमें कितना पीछे कर सकती है?

मैं खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण हूँ!
मुझे बचपन से लिखने का बहुत शौक था। मैं माँ से छिप-छिपकर उनकी “मनोरमा” और दूसरी पत्रिकाएँ पढ़ा करती थी। जब भी उन कहानियों को पढ़ती, मन में एक सवाल उठता – “ये लेखक इतने सुंदर शब्द कहाँ से लाते होंगे? भला मैं कैसे लिख सकती हूँ?”

मन कहता था – “तू भी लिख!”
पर दिमाग कहता – “पागल है क्या? ये तो बड़े साहित्यकारों का काम है। तू क्या लिखेगी?”

और बस, इसी “फिक्स माइंडसेट” ने मुझे बरसों तक रोके रखा। मैं सोचती रही कि “मुझसे नहीं होगा”, और इसी सोच में अपने जीवन के कई कीमती साल बर्बाद कर दिए।

फिर एक दिन, जब मैंने सच में लिखना शुरू किया, तब एहसास हुआ कि यह तो मेरी आत्मा की आवाज़ थी, जिसे मैंने इतने सालों तक दबा रखा था। जिस सपने को मैंने बचपन में देखा था, उसे पूरा करने में मुझे 35 साल लग गए!

अब मैं सोचती हूँ – अगर मैं तब से लिखना शुरू कर देती, तो आज मेरी कलम में कितना निखार आ चुका होता!

फिक्स माइंडसेट कैसे हमें रोकता है?
जब हम किसी चीज़ को करने से पहले ही मान लेते हैं कि “यह मेरे बस का नहीं है”, तो हम खुद को आगे बढ़ने से रोक देते हैं। और धीरे-धीरे यह सोच हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है।

यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई परिंदा पिंजरे में रह-रहकर उड़ना ही भूल जाए!

अगर एपीजे अब्दुल कलाम यह मान लेते कि *”मुझे अंग्रेज़ी नहीं आती, तो मैं वैज्ञानिक नहीं बन सकता,”
अगर धीरूभाई अंबानी मान लेते कि “मैं गरीब परिवार से हूँ, तो मैं बिज़नेस नहीं कर सकता,”
अगर मैरी कॉम यह सोच लेतीं कि “मैं एक महिला हूँ, मैं बॉक्सिंग नहीं सीख सकती,”

तो क्या वे वहाँ होते जहाँ आज हम उन्हें देखते हैं?
माइंडसेट को बदले , खुद को पहचानें!
जब मैंने लिखना शुरू किया, तो मैंने महसूस किया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
अगर आप भी किसी चीज़ को करने की इच्छा रखते हैं, तो सबसे पहले अपनी सोच को बदलें।

माइंडसेट अपनाने के लिए: 
✅ “मैं नहीं कर सकता” को बदलें “मैं सीख सकता हूँ” में।
✅ नए कौशल विकसित करें।
✅ असफलता से डरें नहीं, उसे सीखने का जरिया मानें।
✅ आलोचनाओं से भागने की बजाय उन्हें स्वीकारें।  
✅ हर दिन खुद से सवाल करें – मैं आज क्या नया सीख सकता हूँ?  

निष्कर्ष
आज मैं अपनी इस यात्रा को देखकर सोचती हूँ – काश, मैंने पहले ही अपने डर को छोड़ दिया होता!

लेकिन देर आए, दुरुस्त आए!  

आप भी फिक्स माइंडसेट को अलविदा कहिए और अपने सपनों की ओर कदम बढ़ाइए।
क्योंकि
“जो बदलाव को अपनाता है, वही नए मुकाम पाता है “

 

– सुचिता सकुनिया

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