पर्यावरण संतुलन की महंगी पड़ती उपेक्षा

जलवायु परिवर्तन अब समूची दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है. इसके लिए प्रकृति प्रदत्त मानव संसाधनों का बेतहाशा उपयोग और जंगलों का निर्ममता से किया गया अत्यधिक कटान तो जिम्मेदार है ही, इसमें भौतिक संसाधनों के सुख की मानवीय चाहत और विभिन्न क्षेत्रों के प्रदूषण के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता.बढ़ता वैश्विक तापमान और उसके चलते मौसम में आये अप्रत्याशित बदलाव का दुष्प्रभाव जीवन के हर पक्ष पर पड़ रहा है. इससे हमारा पर्यावरण, जीवन, रहन-सहन, भोजन, पानी, और स्वास्थ्य पर प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.

जीवन का कोई भी पक्ष इसके दुष्प्रभाव से अछूता नहीं है. असलियत में जलवायु परिवर्तन से बदलता मौसम भोजन, स्वास्थ्य और प्रकृति को जो नुकसान पहुंचा रहा है, उसकी भरपाई फिलहाल तो आसान नहीं दिखाई देती. हां, इसके चलते प्राकृतिक असंतुलन के कारण जन्मी आपदाएं भयावह रूप जरूर अख्तियार करती जा रही हैं जो तबाही का सबब बन रही हैं.

आजादी के बाद के 70 सालों में जलवायु परिवर्तन से भारत में ही आपदाओं में आठ गुणा से भी ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज हुई है.इसका खुलासा पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में कार्यरत संगठन ‘आई फारेस्ट’ की रिपोर्ट में हुआ है.रिपोर्ट के मुताबिक आजादी के बाद के शुरुआती सालों में जलवायु परिवर्तन से होने वाली आपदा यानी बाढ़, चक्रवात, हीटवेव आदि की तादाद कुल मिलाकर 27 ही थी, लेकिन उसके बाद के बरसों में इनकी तादाद बढक़र आठ गुणा का आंकड़ा पार कर गयी. वर्ष 2024 तो देश के लिए अभूतपूर्व गर्मी की मार वाला रहा, अप्रैल से जुलाई तक सबसे खराब और सबसे लम्बे समय तक चलने वाली गर्मी की लहरों यानी भयंकर लू की मार सहने को देश विवश हुआ. इस दौरान देश के 741 जिलों में से लगभग 500 जिलों का दैनिक तापमान कम से कम 40 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया.बीते तीन दशकों में अकेले भारत में जलवायु परिवर्तन से जन्मी मौसमी आपदाओं से देश को कुल 180 अरब डालर का नुकसान हुआ और औसतन 4,66,45,209 लोग प्रभावित हुए.1993 से 2022 के बीच देश में हुई चरम मौसमी घटनाओं में करीब 80 हजार लोगों की जानें गयीं. जबकि दुनिया में आठ लाख लोग मौत के मुंह में चले गये और 4.2 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ.इन आपदाओं से सालाना 2000 डॉलर का देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ रहा है, साथ ही 2675 जिंदगियां हर साल इनकी शिकार होती हैं.

पिछले तीन दशक सबूत हैं कि ग्लोबल साउथ के देश विशेष रूप से चरम मौसमी घटनाओं से जूझ रहे हैं. हम जलवायु संकट के अप्रत्याशित और महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर रहे हैं.यह समाज को अस्थिर करने में अहम भूमिका निभाएगा.वहीं संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस का कहना सही है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य अब भी पहुंच से बाहर हैं.यही कारण है कि जलवायु आपदा टालने में दुनिया पिछड़ रही है.समय की मांग है कि समूचा विश्व समुदाय सरकारों पर दबाव बनाये ताकि वे समझ सकें कि इस दिशा में हम पिछड़ रहे हैं और तेजी से आगे बढऩे की ज़रूरत है.यदि वैश्विक प्रयास तापमान को डेढ़ डिग्री तक सीमित करने में कामयाब रहे तो भी दुनिया के 96.1 करोड़ लोगों के लिए यह सबसे बड़ी समस्या होगी। सबसे बड़ा सवाल लोगों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाने का है.यूरोपीय मानवाधिकार अदालत का भी मानना है कि दुनिया के देशों का दायित्व है कि वे अपने नागरिकों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाने का हर संभव प्रयास करें. कुल मिलाकर पर्यावरण संतुलन की उपेक्षा मानवता के लिए महंगी पड़ती जा रही है.

 

 

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