आमतौर पर भूकंप, बाढ़, समुद्री तूफान या रेल तथा वायु दुर्घटनाओं को आपदा माना जाता है. पिछले कुछ वर्षों से आपदा प्रबंधन के प्रति गवर्नेंस के स्तर पर अवेयरनेस भी आई है. केंद्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन को लेकर सतर्क रहती हैं.इसके लिए प्रत्येक राज्य में क्राइसिस मैनेजमेंट या डिजास्टर मैनेजमेंट कमेटियां भी होती हैं. लेकिन अब क्राउड मैनेजमेंट या भीड़ तंत्र को संभालने के लिए भी विशेष उपायों की जरूरत है. देश में आजकल धार्मिक पर्यटन बहुत बढ़ गया है. अयोध्या, काशी, वैष्णो देवी, तिरुपति, शिरडी, उज्जैन और ओंकारेश्वर जैसे धार्मिक स्थलों पर 12 महीने लगातार भीड़ रहती है. इसके अलावा साल भर रामनवमी, हनुमान जयंती, नवरात्र, गणपति विसर्जन, मोहर्रम, मिलादुन्नबी, उर्स, इस्जिमा, इत्यादि धार्मिक अवसरों पर शोभायात्रा, समागम और जुलूस निकलते हैं. ऐसे में भीड़ प्रबंधन को लेकर व्यापक जनजागरण और प्रशिक्षण की बेहद जरूरत है. इसलिए आपदा प्रबंधन की अवधारणा में क्राउड मैनेजमेंट का शामिल किया जाना बहुत जरूरी है. यहां तक कि आपदा और भीड़ प्रबंधन को स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए. जापान, दक्षिण कोरिया, इजरायल, चीन, दक्षिण कोरिया, जर्मनी जैसे देशों में क्राइसिस मैनेजमेंट स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल है. हमारे देश में भी ऐसा ही किया जाना चाहिए. दरअसल, महाकुंभ में उमड़ रही भीड़ के कारण इस तरह के सुझाव बहस का कारण बन गए हैं. प्रयागराज में हुए महाकुंभ और उसके आगे पीछे घटी घटनाओं से यह साबित हो गया है कि ऐसी भगदड़ को रोकने में हमारा प्रशासन अक्षम और लापरवाह है. दरअसल,महाकुंभ में जाने और त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान कर पुण्य कमाने की इच्छा सनातनी और स्वाभाविक है, लेकिन रेलवे स्टेशन की भगदड़ ही अकेली दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है. बीते दिनों बिहार के पटना और अन्य रेलवे स्टेशनों पर भीड़ के हिंसक चेहरे भी दिखाई दिए.वह भीड़ भी महाकुंभ जाने को आमादा थी. यह संस्कृति ही अराजकता और भगदड़ को जन्म देती है.बिहार में बेलगाम भीड़ ने ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बों के दरवाजे और शीशे ही तोड़ दिए. शीशों पर अलग-अलग चीजों से प्रहार किए गए और वे टूट कर बिखर गए.अंदर बैठे कुछ यात्री चोटिल भी हुए होंगे ! भीड़ के विध्वंसक चेहरे सीसीटीवी में कैद हो गए होंगे, यदि वे कैमरे ऑन या कार्यरत होंगे ! केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने उन चेहरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है. वे आम आदमी और विपन्न घरों के होंगे, तो उनसे आर्थिक जुर्माना कैसे वसूल किया जा सकता है ? आप जेल में डाल सकते हैं, लेकिन उनके संस्कार ही हमलावर हैं, तो उन्हें कैसे बदला जा सकता है ? सार्वजनिक संपत्तियां तो बर्बाद होती रही हैं.ये संपत्तियां कुछ मायनों में महाकुंभ में स्नान करने से भी पवित्र और महत्वपूर्ण हैं. ऐसे तोड़-फोड़ करने और भगदड़ मचाने वाले तत्त्व आध्यात्मिक और आस्थामय नहीं हो सकते.रेल मंत्री अक्सर गिनाते रहते हैं कि कितनी हजार रेलगाडिय़ां महाकुंभ के लिए चलाई जा रही हैं. वह अक्सर तसल्ली देते रहते हैं कि समूची व्यवस्था ठीक है.लेकिन हम भीड़-नियंत्रण में अक्षम हैं, नतीजतन बार-बार और वह भी धार्मिक आयोजनों के संदर्भ में ज्यादा भगदड़ें होती रही हैं.महाकुंभ को लेकर शुरुआत में भीड़-नियंत्रण के खूब दावे किए जा रहे थे, लेकिन जब यह दावे कसौटी पर कसे गए तो खोखले निकले. प्रयागराज के बाद नासिक में अर्ध कुंभ होगा. इसके बाद उज्जैन का सिंहस्थ फिर हरिद्वार में कुंभ मेला लगेगा. जाहिर है हमें भीड़ मैनेजमेंट को लेकर स्थाई और विशेष उपाय करने ही होंगे. इस संदर्भ में सरकारी प्रयासों के अलावा जनता में भी जन जागरण जरूरी है.
