स्वास्थ्यगत ढांचे को मजबूत करना जरूरी

केंद्रीय बजट में इस बार हेल्थ सेक्टर को पहले से ज्यादा बजट मिला है. सरकार मेडिकल सीटें बढ़ा रही है. आयुष्मान कार्ड के दायरे को व्यापक किया जा रहा है. मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं. लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण है बुनियादी ढांचागत स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास. खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ें इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए.

अभी भारत में औसतन 10,000 लोगों पर मात्र 2-3 डॉक्टर ही हैं. देश में डॉक्टरों की किल्लत है,जो नए एम्स खड़े किए जा रहे हैं, उनमें डॉक्टरों के आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं, क्योंकि योग्य और विशेषज्ञ डॉक्टरों का बहुत अभाव है.ऐसे में आगामी 5 सालों में 75,000 मेडिकल सीटों का सृजन एक महत्वपूर्ण घोषणा है.उनमें से 10,000 सीटें आगामी एक साल में ही सृजित करने का लक्ष्य तय किया गया है. फिलहाल देश में 1.16 लाख मेडिकल सीटें हैं. नए बजट में 200 जिला अस्पतालों में कैंसर के डे-केयर सेंटर स्थापित करने की घोषणा भी बेहद जरूरी है, क्योंकि महानगरों को छोड़ दें, तो दूरदराज और कस्बाई इलाकों में कैंसर जैसी घातक बीमारी की जांच और उसके इलाज की बुनियादी सुविधाएं ही नहीं हैं.कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टर भी बहुत कम हैं.राजधानी दिल्ली में ही कैंसर अस्पताल में न तो नियमित डॉक्टर हैं और न ही जांच करने वाली मशीनें कार्यरत हैं.औसतन मरीज को 7-8 महीने बाद की तारीख दी जाती है.इतने अंतराल में मरीज की मौत भी संभावित है, लिहाजा 200 केंद्र खोलने की घोषणा महत्वपूर्ण है, लेकिन यह चरणबद्ध होनी चाहिए कि कब, कितने केंद्र खुलेंगे और बाकायदा सुचारू रूप से काम करना शुरू कर देंगे ? यह भी गौरतलब सवाल है कि कैंसर केंद्रों का संचालन कैसे किया जाएगा ? क्या उनका संचालन निजी भागीदारी के साथ होगा अथवा सरकार के स्तर पर ही तमाम बंदोबस्त किए जाएंगे?

निजी अस्पतालों में कैंसर के इलाज की सुविधाएं तो हैं, लेकिन इलाज बेहद महंगा है.औसत व्यक्ति इतना पैसा खर्च करने में असमर्थ है.कुछ साल पहले इसी तर्ज पर जिला अस्पतालों में गुर्दा मरीजों के लिए डायलिसिस की सुविधा शुरू की गई थी. उसका फायदा काफी लोगों को मिला था. इसी तरह कैंसर के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है. स्वास्थ्य बजट के राजनीतिक आयाम भी हैं

मोदी सरकार ने ‘आयुष्मान भारत’ योजना लागू तो कर रखी है, लेकिन उसका भी अर्धसत्य यह है कि सिर्फ सर्जरी के मामले में ही वह कार्ड मान्य है. यदि आप अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं, तो ‘आयुष्मान’ के जरिए इलाज नहीं करा सकते. ‘आयुष्मान’ की पात्रता के लिए भी कई शर्तें हैं, लिहाजा उन्हीं को यह सेवा उपलब्ध है, जो बिल्कुल वंचित जमात के हैं. विश्व बैंक के अनुसार, भारत में सरकार 50.2 प्रतिशत इलाज का ही खर्च उठाती है.शेष 49.8 प्रतिशत लोग अपनी जेब से ही इलाज कराने को विवश हैं. दिल्ली की सरकार ‘मुफ्त स्वास्थ्य’ के जुमले का शोर मचाती रही है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में आम आदमी की स्थिति कीड़े-मकौड़े जैसी है. डॉक्टरों का व्यवहार बेहद रूखा है .शायद ही कोई अपवाद होगा, जिसका इलाज दिल्ली सरकार ने अपने खर्च पर निजी अस्पताल में कराया होगा! वैसे भी इन समस्याओं का बजट में अक्सर उल्लेख नहीं होता. बजट तो भारत सरकार की ‘बैलेंस शीट’ होती है. 2025-26 में स्वास्थ्य बजट 99,858 करोड़ रुपए आवंटित किया गया है. बीते वित्त वर्ष की तुलना में यह 8-9 हजार करोड़ रुपए अधिक है. यह पर्याप्त नहीं है. बजट में अनुसंधान पर भी विशेष फोकस किया गया है.चालू वित्त वर्ष में अनुसंधान विभाग का बजट 3301 करोड़ रुपए था. उसे बढ़ाकर 3900 करोड़ किया गया है. कुछ गंभीर बीमारियों की जीवनरक्षक दवाएं सस्ती करने की घोषणा की गई है. दरअसल, शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट कमोबेश 6 फीसदी होने चाहिए. चूंकि मुद्रास्फीति बढ़ती रही है, लिहाजा बजट का कमोबेश 10 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करना चाहिए. कुल मिलाकर स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा मजबूत करने की सख्त जरूरत है.

 

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