विकास की मांग पर महिला सदस्यों का धरना ने खड़े किए सवाल

हासिए में अपनी हैसियत मानने वाले जिला पंचायत सदस्यों का मुखरित हुआ विरोध
सतना:अपनी परम्परागत जीवन शैली की पहचान कायम रखने वाले जिले में निर्वाचित महिला सदस्यों का विकास की मांग पर विरोध जिले की राजनैतिक तासीर में नया रंग घोल गया.संयोग था कि जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी महिला आई ए एसअधिकारी होने के कारण बात बढऩे के वजाय जल्द ही उनके आश्वासन के बाद समाप्त हो गया.गौरतलब है कि मंगलवार को जिला पंचायत की सामान्य प्रशासन समिति की बैठक के लिए कई हफतेपहले एजेण्डा जारी किया गया था.

जिला पंचायत की पक्षपातपूर्ण गतिविधियों से असंतुष्ट सदस्यों का एक बडा गुट इसी इन्तजार में बैठा हुआ था कि कब सामूहिक रूप से विरोध दर्ज कराने का अवसर मिले और वे अपने रूख्र से अन्य सदस्यों, अधिकारियों और पदाधिकारियों को परिचित करा सके.योजना के मुताबिक बैठक के लिए जब सब सदस्य उपस्थित हुए तो छह महिला सदस्यों के एक समूह ने बैठक के लिए निर्धारित कक्ष में जाने के वजाय कक्ष के बाहर ही बैठकर अपना विरोध जताने लगे.महिला सदस्यों के इस रूख से अनभिज्ञ अन्य सदस्यों के लिए यह घटनाक्रम चिन्ता में डालने वाला था.
बाद में नाराज सदस्यों से पूछताछ का क्रम शुरू हुआ.

अधिकारियों ने अपने स्तर से समझाने का प्रयास किया,लेकिन उसका कोई प्रभाव नहीं पडा.जिला पंचायत अध्यक्ष रामखेलावन कोल और संचार सकर्म समिति के सभापति ज्ञानेन्द्र सिंह ज्ञानू भी पहुंचे फिर भी अपनी बात पर अडी महिला सदस्यों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.मामला बिगडते देख जिला पंचायत की सीईओ संजना जैन भी पहुची.सदस्यों ने खुलकर उनके सामने अपनी बात कहते हुए कहा कि उनकी जिला पंचायत में उपेक्षा हो रही है.विधानसभा के एक तिहाई हिस्से से निर्वाचन के बाद वो यहां पहुची है.

पंचायतीराज कानून के तहत उन्हे जिस प्रकार का महत्व मिलना चाहिए वह नहीं दिया जा रहा है.एक पार्टी विशेष से नाता रखने वालों के काम किए जा रहे हैं.उन्हीं के क्षेत्र में काम भी स्वीकृत किए जा रहे है.हमारे प्रस्तावों पर कोई विचार ही नहीं किया जा रहा है.साथ ही जिला पंचायत का कार्यकाल का आधा समय बीत जाने के बाद भी योजना समिति को लेकर जिला प्रशासन गम्भीर नहीं है.निर्वाचित सदस्यों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है.हालांकि बाद में सीईओ की समझाइस के बाद नाराज सदस्य बैठक में जाने को लेकर सहमत हो गयी.विरोध करने वाली महिला सदस्यों में एकता सिंह,संध्या कुशवाहा,मंजुला सिंह,सवित्रि त्रिपाठी,लक्ष्मी मवासी और प्रियंका वर्मा शामिल थी.
सत्तापक्ष का महत्व ज्यादा
देखने में आया है कि दलगतचुनाव नहीं होने के बावजूद पंचायतराज व्यवस्था में खुलकर दलगत राजनीति प्रभावी है.जिला पंचायत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्वाचन के बाद जो पार्टी बन्दी दिखाई देना प्रारम्भ हुई उसमें कभी कोई कमी नजर नहीं आयी.पहले की जिला पंचायतों में ऐसा कम ही नजर आता था.अब अधिकारी भी पंचायत प्रतिनिधियों को उसी मान से देखकर महत्व देते है.वर्तमान में जिला पंचायत के महत्वपूर्ण समितियों और पदों पर भारतीय जनता पार्टी समर्थित सदस्यों का कब्जा है.दो जिलों की अकेली जिला पंचायत होने से बजट को लेकर सदस्यों में खीचतान लगी रहती है.बजट व्यय की कोई आदर्श स्थिति नहीं होने के कारण सदस्य भी खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे है.
सरकार अधिकारों के विकेन्द्रीकरण पर गम्भीर नहीं
प्रदेश की वर्तमान सरकार पंचायतीराज के तहत मिले अधिकारों के क्रियान्वयन के प्रति उतनी गम्भीर नहीं है.पंचायतों की मूलभूत की राशि को केन्द्रीयकृत कर दिया गया है.जनपद पंचायतें हासिए में पहुच गई है.जिले की ज्यादातर जनपदों को सीईओ संचालित कर रहे है.जहां नियुक्ति नहीं है वहां प्रभारियों को काम सौपा गया है.जिला सरकार की नीति पूरी तरह से लुप्त हो चुकी है.योजना समितिका वर्षों से पुर्नगठन नहीं किया गया.जिला योजना के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जा रही है.

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