उच्चतम न्यायालय ने अमेज़ॅन, वॉलमार्ट से जुड़ी प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथा संबंधित याचिकाएं कर्नाटक उच्च न्यायालय हस्तांतरित की

नयी दिल्ली 06 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने अमेज़ॅन और वॉलमार्ट के फ्लिपकार्ट ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों की कथित प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं से संबंधित सभी याचिकाओं को सोमवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय की एकल पीठ को निर्णय के लिए स्थानांतरित कर दिया।

न्यायमूर्ति अभय ओका और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया।

पीठ ने सभी संबंधित पक्षों द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष इस तरह के हस्तांतरण के लिए सहमति जताने के बाद मामलों को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने मामले को स्थानांतरित करने की मांग की थी क्योंकि जनहित से जुड़ी याचिकाएं दिल्ली, पंजाब और हरियाणा, कर्नाटक और इलाहाबाद के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित थीं।

शीर्ष अदालत ने पहले अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरामनी को दो दर्जन से अधिक याचिकाओं को कर्नाटक उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश पीठ में स्थानांतरित करने के लिए सीसीआई से निर्देश लेने के लिए कहा था।

याचिकाओं में कहा गया है कि दो प्रमुख प्लेटफार्मों द्वारा दी जाने वाली ई-कॉमर्स सेवाओं से संबंधित पूछताछ बहुत सामान्य महत्व की है क्योंकि अगर इन प्लेटफार्मों पर किसी भी प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधि को जारी रखने की अनुमति दी जाती है तो यह हर गुजरते दिन लाखों नहीं तो करोड़ों आम लोगों को नुकसान पहुंचाती है। उन्हें प्रभावित करती हैं।

इसमें कहा गया है कि भले ही जांच 2020 में शुरू होनी थी लेकिन मुकदमेबाजी के पहले दौर में अमेज़ॅन और फ्लिपकार्ट के पक्ष में दिए गए स्थानादेश के कारण इसमें काफी देरी हुई।

सीसीआई ने अपनी स्थानांतरण याचिका में कहा, “चार साल बीत चुके हैं और वर्तमान मामले में अंतिम आदेश पारित किया जाना बाकी है।”

सीसीआई ने अमेज़ॅन और फ्लिपकार्ट द्वारा प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के उल्लंघन के दिल्ली व्यापार संघ के आरोपों को प्रथम दृष्टया सही बताया।

इसमें आरोप लगाया गया कि ई-कॉमर्स कंपनियां प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन करते हुए विशेष व्यवस्था, भारी छूट आदि में शामिल रहीं।

सीसीआई ने महानिदेशक द्वारा जांच का आदेश दिया जिसे अमेज़ॅन और फ्लिपकार्ट ने चुनौती दी।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सितंबर में अमेज़ॅन के खिलाफ आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी। इसके बाद अन्य सभी उच्च न्यायालयों में भी इसी तरह के आदेश पारित हुए।

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