नोटों की झालरें, सोने-चांदी के गहने और करोड़ों की सजावट, रतलाम का अनोखा महालक्ष्मी मंदिर

डॉ संजय उपाध्याय

रतलाम: देशभर में दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है, लेकिन मध्य प्रदेश के रतलाम में दीपावली के दौरान एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो अपने आप में अनूठी है। यहां माणकचौक स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर में पांच दिनों तक भक्तों की नकदी और कीमती आभूषण माता के श्रृंगार का हिस्सा बनते हैं। कोई सोने के गहने लेकर पहुंचता है तो कोई चांदी के सिक्के और नोटों की गड्डियां अर्पित करता है। देखते ही देखते मंदिर नोटों की झालरों और सोने-चांदी के आभूषणों से जगमगा उठता है।
करीब 300 से 400 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में शामिल होने के लिए देश के अलग-अलग शहरों के अलावा विदेशों में रहने वाले भारतीय श्रद्धालु भी अपनी संपत्ति मंदिर में जमा कराते हैं। इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि पांच दिनों तक माता के श्रृंगार में शामिल रहने के बाद भक्तों को उनकी जमा कराई गई नकदी और आभूषण वापस कर दिए जाते हैं। इसके साथ उन्हें प्रसाद के रूप में कुबेर पोटली भी दी जाती है।
रियासतकाल से जुड़ी है मंदिर की परंपरा
रतलाम के इस मंदिर की परंपरा को लेकर मान्यता है कि रियासत के संस्थापक महाराजा रतन सिंह राठौड़ ने नगर की खुशहाली और प्रजा की समृद्धि के लिए माणकचौक में मां महालक्ष्मी का मंदिर स्थापित करवाया था। कहा जाता है कि दीपावली के अवसर पर महाराजा ने अपना शाही खजाना माता के चरणों में अर्पित किया था। इसमें सोना, चांदी और कीमती रत्न शामिल थे।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नगर के व्यापारी और श्रद्धालु भी दीपावली पर अपनी संपत्ति माता के दरबार में अर्पित करने लगे। समय के साथ यह आयोजन रतलाम की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन गया।
शरद पूर्णिमा से शुरू हो जाती है तैयारियां
मंदिर में दीपावली के विशेष श्रृंगार की तैयारियां शरद पूर्णिमा से ही शुरू हो जाती हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार नकदी, सोने-चांदी के आभूषण और सिक्के मंदिर में जमा कराते हैं। इसमें 10 रुपये से लेकर 500 रुपये तक के नोट शामिल होते हैं।
इसके बाद मंदिर के पुजारी और सेवादार नोटों को जोड़कर आकर्षक झालरें तैयार करते हैं। इन झालरों को गर्भगृह, छत और दीवारों पर सजाया जाता है। सोने-चांदी के आभूषणों से मां महालक्ष्मी का विशेष श्रृंगार किया जाता है। मंदिर में जमा होने वाली संपत्ति का मूल्य करोड़ों रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं सशस्त्र जवान
मंदिर में बड़ी मात्रा में नकदी और कीमती आभूषण जमा होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद खास रहती है। मंदिर के ठीक पीछे माणकचौक थाना स्थित है। आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में पुलिस के सशस्त्र जवान तैनात किए जाते हैं। पांच दिनों तक श्रद्धालुओं की आवाजाही और मंदिर में रखी संपत्ति की सुरक्षा पर विशेष निगरानी रखी जाती है।
भक्तों को लौटाई जाती है जमा पूंजी, मिलती है कुबेर पोटली
महालक्ष्मी मंदिर में कुबेर पोटली की परंपरा भी श्रद्धालुओं के बीच खास महत्व रखती है। मंदिर के पुजारी अश्विन के अनुसार, मां महालक्ष्मी की प्रतिमा के हाथों में एक पोटली दिखाई देती है, जिसे कुबेर पोटली कहा जाता है। इसी का प्रतीकात्मक स्वरूप भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है।
पांच दिनों तक चलने वाले आयोजन के बाद श्रद्धालुओं को उनके जमा कराए गए रुपये और आभूषण वापस कर दिए जाते हैं। इसके साथ कुबेर पोटली भी दी जाती है। भक्त इसे धन और खुशहाली का प्रतीक मानकर सालभर अपनी तिजोरी में रखते हैं। भाईदूज के अगले दिन से संपत्ति लौटाने का सिलसिला शुरू होता है।
अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूपों के भी होते हैं दर्शन
सराफा बाजा के बीच स्थित इस मंदिर में मां महालक्ष्मी के साथ अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूपों के दर्शन भी होते हैं। इनमें आदि लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी शामिल हैं।
आमतौर पर मंदिर में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन धनतेरस से भाईदूज तक यहां का नजारा पूरी तरह बदल जाता है। नोटों की झालरें, सोने-चांदी के आभूषण और माता का भव्य श्रृंगार देखने के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। रतलाम का यह महालक्ष्मी मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही ऐसी परंपरा का प्रतीक है, जिसमें श्रद्धालु पांच दिनों के लिए अपना खजाना मां के चरणों में समर्पित कर देते हैं।

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