श्रद्धालुओं के पैरों में चुभ रहीं अव्यवस्थाओं की गिट्टियां

सतना: आस्था, विश्वास और भक्ति की नगरी चित्रकूट में दीपावली का मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा, श्रद्धा और सनातन संस्कृति का विराट उत्सव है। पांच दिनों तक चित्रकूट की धरती राममय हो जाती है। मंदाकिनी के घाटों पर दीपदान, मंदिरों में दर्शन और भगवान कामतानाथ की परिक्रमा के लिए देशभर से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। दीपावली के अवसर पर चित्रकूट की छटा देखते ही बनती है। लेकिन इस बार मेले की भव्यता और प्रशासनिक तैयारियों के दावों के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ उनकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े करती है।

6 से 10 नवंबर तक आयोजित होने वाले दीपावली मेले का आगाज कल यानि 6 नवंबर से होना है। प्रशासन का अनुमान है कि पांच दिनों में 30 से 40 लाख श्रद्धालु चित्रकूट पहुंचेंगे। इतनी बड़ी संख्या में आने वाले भक्तों की सुविधा के लिए पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, कार्यपालिक मजिस्ट्रेट और विभिन्न विभागों के मैदानी अमले की ड्यूटी लगाई जा रही है। बैठकों में व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद रखने के निर्देश भी दिए जा रहे हैं। अधिकारी तैयारियों को लेकर अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन इन दावों की हकीकत उस वक्त सामने आ जाती है, जब चित्रकूट की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक गतिविधि यानी कामदगिरि की परिक्रमा की स्थिति देखी जाती है।

आस्था के रास्ते पर बिखरी बालू-बजरी, कैसे होगी परिक्रमा
चित्रकूट आने वाले श्रद्धालुओं के लिए कामदगिरि की परिक्रमा सबसे बड़ा धार्मिक संकल्प होती है। मान्यता है कि भगवान कामतानाथ की परिक्रमा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि दीपावली के दौरान परिक्रमा पथ पर श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि कदम रखने तक की जगह नहीं बचती। लेकिन इस बार मेले के ठीक पहले भी परिक्रमा मार्ग पूरी तरह तैयार नजर नहीं आ रहा है। कहीं बालू-बजरी बिखरी पड़ी है तो कहीं पटियों की स्थिति ऐसी है कि श्रद्धालुओं के पैर फंसने और लडख़ड़ाकर गिरने का खतरा बना हुआ है। सवाल यह है कि जब मेले के दौरान लाखों श्रद्धालुओं को इसी मार्ग से गुजरना है, तब अधूरे और असमतल रास्ते पर भीड़ का दबाव कैसे संभाला जाएगा…? बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और नंगे पैर परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु आखिर इन रास्तों पर कैसे सुरक्षित चल पाएंगे…? आस्था के इस मार्ग पर एक छोटी सी लापरवाही भी किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।

सरकारी धन खर्च हुआ, परिक्रमा पथ की बदहाल तस्वीर नहीं बदली

विडंबना यह है कि चित्रकूट विकास प्राधिकरण के तहत उपलब्ध सरकारी धन से परिक्रमा मार्ग के मरम्मत और नवीनीकरण का काम कराया गया। इसके बावजूद मार्ग की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। कई स्थानों पर लगाई गई पटियों की बनावट और उनकी फिटिंग ऐसी है कि परिक्रमा करने वालों के पैर उनमें फंस जाते हैं। श्रद्धालुओं के चोटिल होने की आशंका के साथ ऐसी घटनाएं सामने आने की बात भी कही जा रही है। आखिर लाखों लोगों की आस्था से जुड़े इस महत्वपूर्ण मार्ग पर निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निगरानी किसने की…? इसकी तुलना जब उत्तर प्रदेश की ओर आने वाले परिक्रमा मार्ग से होती है तो अंतर और भी साफ दिखाई देता है। वहां परिक्रमा पथ को बेहतर ढंग से व्यवस्थित और सुंदर बनाया गया है। मार्ग पर रंगीन और व्यवस्थित फर्श श्रद्धालुओं को सहजता से चलने की सुविधा देता है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश की ओर अलग से किसी विशेष प्राधिकरण का बड़ा फंड उपलब्ध नहीं होने के बावजूद वहां की व्यवस्थाएं बेहतर नजर आती हैं। दूसरी ओर मध्यप्रदेश के हिस्से में सरकारी धन खर्च होने के बाद भी परिक्रमा मार्ग की यह स्थिति व्यवस्था और निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

मंदाकिनी के टूटे पुल का विकल्प तैयार,

हालांकि मेले की व्यवस्थाओं के बीच कुछ राहत भरी तस्वीरें भी सामने आई हैं। मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ के दौरान पुल क्षतिग्रस्त होने के बाद हनुमान धारा की ओर आवागमन के लिए वैकल्पिक पीपा पुल तैयार कर दिया गया है। इसके माध्यम से लोगों की आवाजाही भी बहाल हो चुकी है। चित्रकूट की सुंदरता और धार्मिक गरिमा बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन इतने बड़े आयोजन में केवल वैकल्पिक रास्ते तैयार कर देना पर्याप्त नहीं है। श्रद्धालुओं को सुरक्षित और सुविधाजनक आवागमन उपलब्ध कराना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
सवाल आस्था के साथ व्यवस्था की जवाबदेही का है
चित्रकूट का दीपावली मेला किसी एक विभाग का आयोजन नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों की साझा धार्मिक विरासत का उत्सव है। यहां आने वाला श्रद्धालु सरकारी दावों और विभागीय बैठकों को देखने नहीं आता। वह भगवान कामतानाथ के दर्शन, मंदाकिनी में दीपदान और कामदगिरि की परिक्रमा के लिए अपनी श्रद्धा लेकर पहुंचता है। उसकी अपेक्षा बस इतनी है कि उसे सुरक्षित रास्ता, स्वच्छ वातावरण और व्यवस्थित सुविधाएं मिलें। पिछले वर्ष प्रशासनिक तैयारियों और व्यवस्थाओं को लेकर जो बेहतर तस्वीर सामने आई थी, इस बार वैसी सक्रियता और तैयारी जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में मेले के आगाज से पहले प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती कामदगिरि परिक्रमा मार्ग को दुरुस्त करने की है। लाखों श्रद्धालुओं की आस्था जिस रास्ते से होकर गुजरेगी, उस रास्ते पर बालू-बजरी और खतरनाक पटियों का बिखरा होना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। भगवान कामतानाथ के दरबार में श्रद्धालु सिर झुकाने आते हैं, प्रशासन को उनकी सुरक्षा के लिए सिर उठाकर जिम्मेदारी निभानी होगी। मेले की भव्यता सजावट और दावों से नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं को मिलने वाली सुरक्षित और सुगम सुविधाओं से तय होगी।

 

समाप्त करना होगा सीढिय़ों वाला बॉटलनेक
चित्रकूट में दिवाली मेले के दौरान एक बड़ा खतरा श्रद्धालुओं के लिए वो बॉटलनेक व उसके साथ वो मंदिर है जिसे लोग अज्ञानता वस उसके अंदर प्रवेश करना ही कामतानाथ के उत्तम दर्शन मानते हैं। जबकि राम मोहल्ले की प्रथम पदक्षिणा द्वारा मंदिर से बाहर निकलने में एक खतरनाक ढ़ाल है जिससे बाहर निकलने में फिसलन के कारण भगदड़ या कोई गिर सकता है जिसके बाद कैसे भयावह परिणाम होंगे इसका अंदाजा प्रशासन नहीं लगा रहा और इस हादसेे भरे अव्यवस्था को नजरअंदाज कर रहा है।

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