यूपीआई पर शुल्क से छोटे विक्रेताओं के नकदी की ओर लौटने का जोखिम: सर्वेक्षण रिपोर्ट

हैदराबाद, 04 नवंबर (वार्ता) यूपीआई के माध्यम से दो हजार रुपये से अधिक के लेनदेन पर प्रस्तावित शुल्क से छोटे विक्रेताओं के वापस नकदी की ओर लौटने का जोखिम है।

इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) के एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन 24 सितंबर से 10 अक्टूबर के बीच कराए गए सर्वेक्षण पर आधारित है।

सरकार ने व्यापारियों के खातों में दो हजार रुपये से ऊपर के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने की घोषणा की है। पहले इसे 15 अक्टूबर से ही लागू किया जाना था, लेकिन उससे पहले ही दिवाली तक के लिए टाल दिया गया। सरकार ने कहा है कि दिवाली के बाद इसे लागू करने के लिए नई तिथि को घोषणा की जाएगी। हालांकि व्यापारियों से इतर आम लोगों के लिए कितनी भी राशि के लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं होगा। साथ ही महीने में एक लाख रुपये तक के कुल लेनदेन को भी इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस ने बुधवार को जारी रिपोर्ट में कहा है कि सर्वेक्षण में शामिल 67 प्रतिशत सड़क विक्रेता यूपीआई भुगतान स्वीकार करते हैं, लेकिन सिर्फ 52 प्रतिशत को ही प्रस्तावित शुल्क के ढांचे के बारे में जानकारी है। टीयर-1, 2 और 3 के विभिन्न शहरों में कराए गए सर्वेक्षण में 45 प्रतिशत से 53 प्रतिशत विक्रेताओं ने कहा कि यदि शुल्क लागू किए जाते हैं, तो वे यूपीआई के जरिए भुगतान लेना कम कर देंगे।

आईएसबी के ‘सेंटर फॉर एनालिटिकल फाइनेंस’ द्वारा किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि भले ही विक्रेताओं की अपनी बिक्री पर कोई शुल्क न लगे, लेकिन उनके द्वारा आपूर्तिकर्ताओं को किए जाने वाले बड़े भुगतानों पर लगने वाले शुल्क से उन पर असर पड़ सकता है। यदि आपूर्तिकर्ता इस लागत का बोझ छोटे विक्रेताओं पर डालते हैं, तो विक्रेताओं का कहना है कि वे नकद में माल की खरीद शुरू कर देंगे या ग्राहकों से यह लागत वसूलेंगे। इससे नकद के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हो सकती है या ग्राहकों के लिए खर्च बढ़ सकता है।

यह अध्ययन 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तथा 64 शहरी स्थानीय निकायों के 722 सड़क विक्रेताओं के सर्वेक्षण पर आधारित है। इस शोध में यूपीआई को अपनाने की स्थिति, प्रस्तावित एमडीआर ढांचे के बारे में जागरूकता और संभावित लेनदेन शुल्क पर विक्रेताओं की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण किया गया है।

सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि टियर-1 शहरों में 82 प्रतिशत विक्रेता डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हैं, जबकि टियर-2 शहरों में यह आंकड़ा 66 प्रतिशत और टियर-3 शहरों में 64 प्रतिशत है। टियर-1 के 66 प्रतिशत विक्रेताओं ने इन शुल्कों के बारे में सुना था, जबकि टियर-2 में यह आंकड़ा 55 प्रतिशत और टियर-3 में 47 प्रतिशत था। जो विक्रेता यूपीआई भुगतान स्वीकार करते हैं, उनमें से 64 प्रतिशत को इन प्रस्तावित शुल्कों की जानकारी थी, जबकि यूपीआई स्वीकार न करने वालों में से केवल 26 प्रतिशत को ही इसके बारे में पता था। जानकारी होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें यह भी समझ हो कि यह ढांचा किस पर लागू होगा। एमडीआर के बारे में सुनने वाले विक्रेताओं में से टियर-1 के 48 प्रतिशत, टियर-2 के 46 प्रतिशत और टियर-3 के 33 प्रतिशत विक्रेताओं का मानना था कि यह शुल्क उन पर लागू होगा।

सर्वेक्षण में शामिल लगभग 70 प्रतिशत विक्रेता अपने आपूर्तिकर्ताओं को एक बार में 2,000 रुपये से अधिक का भुगतान करते हैं। इसका मतलब है कि ये लेनदेन उस दायरे में आते हैं, जिस पर प्रस्तावित ढांचा लागू हो सकता है।
एक चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि 10.4 प्रतिशत विक्रेताओं से सर्वे से पहले के 10 दिन में उनके आपूर्तिकर्ताओं ने यूपीआई लेनदेन के लिए अतिरिक्त शुल्क की मांग की थी जबकि अभी ये लागू नहीं हुए हैं।

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