बाघों का संरक्षण सरकार की प्राथमिकता बने

मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट और चीता स्टेट होने का गौरव हासिल है. प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य न केवल जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि पर्यटन के क्षेत्र में भी मध्य प्रदेश की पहचान मजबूत कर रहे हैं.ऐसे में इन वन्यजीवों की सुरक्षा और संरक्षण सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए. कान्हा टाइगर रिजर्व में लगातार हो रही बाघों की मौत ने वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.दरअसल, कान्हा टाइगर रिजर्व में 11 बाघों की मौत हो चुकी है.इन बाघों की मौत के बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार से 15 दिन में जवाब मांगा है. अदालत ने पिछले दस वर्षों में वन्यजीव संरक्षण परियोजनाओं के लिए केंद्र से मध्य प्रदेश को मिले बजट का हिसाब भी मांगा है. यह स्थिति बताती है कि वन्यजीव संरक्षण के लिए केवल योजनाएं और बजट आवंटन पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी भी जरूरी है.

सीडीवी संक्रमण का फैलाव आवारा कुत्तों के जरिए होने की आशंका है. वन विभाग का दावा है कि कान्हा के आसपास के गांवों में करीब 2700 आवारा कुत्तों को वैक्सीन की बूस्टर डोज लगाई जा चुकी है. यह कदम महत्वपूर्ण है, लेकिन संक्रमण की रोकथाम के लिए इसे व्यापक और सतत अभियान का रूप देना होगा. केवल कान्हा तक सीमित रहने के बजाय प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के आसपास के क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की पहचान, टीकाकरण और निगरानी की व्यवस्था जरूरी है. इसके साथ ही वन्यजीवों में संक्रमण की समय रहते पहचान के लिए नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और आधुनिक जांच सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए.

दरअसल, बाघ और चीते केवल जंगलों की शोभा नहीं हैं, बल्कि वे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन के महत्वपूर्ण आधार हैं. बाघ जंगल की खाद्य शृंखला में शीर्ष पर रहने वाला जीव है. उसकी मौजूदगी जंगल के बेहतर स्वास्थ्य का संकेत मानी जाती है. इसी तरह चीता संरक्षण परियोजना ने मध्य प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी है. कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की मौजूदगी ने देश-दुनिया के पर्यटकों का ध्यान आकर्षित किया है. वन्यजीव पर्यटन से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आजीविका के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं. इसलिए वन्यजीवों की सुरक्षा का सवाल केवल वन विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पर्यावरण, पर्यटन और प्रदेश की अर्थव्यवस्था से भी है.

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वन्यजीव संरक्षण के लिए आवंटित बजट का उपयोग समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से हो. टाइगर रिजर्व के कोर और बफर क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, वन्यजीव चिकित्सकों और विशेषज्ञों की नियुक्ति, संक्रमण की जांच के लिए प्रयोगशालाओं की उपलब्धता तथा वन विभाग के अमले को आधुनिक संसाधन देने पर विशेष ध्यान देना होगा. साथ ही वन क्षेत्रों के आसपास मानवीय गतिविधियों, आवारा पशुओं और कुत्तों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय समुदायों को भी अभियान से जोडऩा होगा. बहरहाल,

हाईकोर्ट की चिंता को सरकार के लिए चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए. बाघों और चीतों का संरक्षण किसी एक परियोजना की सफलता नहीं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के लिए प्राकृतिक विरासत बचाने का दायित्व है. इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए.

 

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