नयी दिल्ली, 04 नवंबर (वार्ता) रेलवे बोर्ड ने रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) की सुरक्षा तैनाती व्यवस्था में बड़े बदलाव करते हुए आदेश दिया है कि संवेदनशील रेलवे स्थलों वाले क्षेत्रों में कर्मचारियों की तैनाती एक साल के लिए होगी और जोखिम के आधार पर वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी हर साल अनिवार्य रुप से क्षेत्र का निरीक्षण करेंगे। बोर्ड ने यह निर्णय संवेदनशील रेलवे स्थलों पर इलेक्ट्रॉनिक जासूसी की आशंका से जुड़ी घटनाओं की खबरों के मद्देनजर लिया है। इस निर्देश का उद्देश्य ड्यूटी के स्थानों में बार-बार बदलाव, संवेदनशील रेलवे प्रतिष्ठानों की पर्याप्त जानकारी न होने और पूरे रेलवे नेटवर्क में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने में आने वाली कठिनाइयों के कारण पैदा हुई सुरक्षा संबंधी कमियों को दूर करना है।
आरपीएफ की महानिदेशक सोनाली मिश्रा की ओर से जारी इस निर्देश में विशेष रूप से अमृतसर-मानावाला रेलवे खंड, सोनीपत और दिल्ली कैंट में ओवरहेड उपकरण (ओएचई) के खंभों पर बिना अनुमति लगाए गए सौर ऊर्जा से चलने वाले, सिम कार्ड युक्त सीसीटीवी कैमरों के जरिये इलेक्ट्रॉनिक जासूसी की कथित घटनाओं का उल्लेख किया गया है।रेलवे बोर्ड ने चेतावनी दी है कि रेलवे की सुरक्षा के लिए खतरे अब पारंपरिक अपराध, आतंकवाद और तोड़फोड़ तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इनमें टोह लेना, बिना अनुमति निगरानी करना, दुष्प्रचार, डिजिटल माध्यमों से लोगों को संगठित करना और रेलवे की संपत्तियों में हस्तक्षेप करना भी शामिल हो गया है। निर्देश में कहा गया है, “अलग-अलग देखने पर ऐसी घटनाएं सीमित लग सकती हैं, लेकिन सामूहिक रूप से ये उभरती सुरक्षा कमजोरियों, काम करने के बदलते तरीकों और अधिक गंभीर शत्रुतापूर्ण गतिविधियों के संकेतों को उजागर कर सकती हैं।” गत 30 अक्टूबर को सभी क्षेत्रीय रेलवे को भेजे गए ये निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू हो गये हैं।
नयी व्यवस्था के तहत प्रत्येक आरपीएफ पोस्ट के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट रूप से निर्धारित बीट और उप-बीट में बांटा जाएगा। इनमें रेलवे स्टेशन, प्लेटफॉर्म, रेल पटरी, यार्ड, पुल, सुरंग, कार्यशालाएं, उत्पादन इकाइयां और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान शामिल होंगे। प्रत्येक उप-बीट की संवेदनशीलता, अपराध के तरीकों, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों से निकटता, कानून-व्यवस्था की स्थिति तथा अंतरराष्ट्रीय, अंतरराज्यीय या मंडलीय सीमाओं के पास उसकी स्थिति का आकलन करने के बाद उसे सामान्य, संवेदनशील या अति संवेदनशील श्रेणी में रखा जाएगा। प्रत्येक उप-बीट में गश्त की आवृत्ति, सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की अवधि और निगरानी की सघनता का निर्धारण उसकी सुरक्षा श्रेणी और आंकी गई संवेदनशीलता के आधार पर किया जाएगा।
सुरक्षा व्यवस्था में निरंतरता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से रेलवे बोर्ड ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए निर्देश दिया है कि वरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्त या मंडल सुरक्षा आयुक्त की अनुमति के बिना बीट और उप-बीट में तैनाती में कम से कम एक साल तक बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। यह प्रावधान विशेष रूप से बीट और उप-बीट की जिम्मेदारियों के आवंटन से संबंधित है। इसका मतलब यह नहीं है कि तबादलों या नियमित पाली के आधार पर होने वाली तैनाती पर पूरी तरह रोक लगा दी गयी है।
बोर्ड ने स्वीकार किया कि पहले सिपाहियों और हेड कांस्टेबलों को ड्यूटी के स्थानों के बीच बार-बार बदलने की व्यवस्था के कारण उन्हें अपने निर्धारित क्षेत्रों की पर्याप्त जानकारी नहीं हो पाती थी। इससे सुरक्षा व्यवस्था में निरंतरता की कमी और सूचनाओं का अभाव पैदा होता था। इसके परिणामस्वरूप सुरक्षा कर्मियों को अपने जिम्मेदारी वाले क्षेत्रों में असामान्य गतिविधियों और संभावित खतरों की पहचान करने में अक्सर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
नयी व्यवस्था के तहत उपनिरीक्षक और सहायक उपनिरीक्षक बीट अधिकारी के रूप में काम करेंगे, जबकि निर्धारित हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल उप-बीट प्रभारी की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसके साथ ही सहयोगी व्यवस्था भी शुरू की जाएगी। इसके तहत नामित वैकल्पिक सुरक्षा कर्मी छुट्टी, प्रशिक्षण या अन्य कारणों से निर्धारित अधिकारी या कांस्टेबल के अनुपलब्ध रहने पर उनकी जिम्मेदारी संभालेंगे। उप-बीट के मामले में वैकल्पिक कर्मियों का चयन आसपास के क्षेत्रों से किया जाएगा, ताकि सुरक्षा निगरानी में निरंतरता बनी रहे।
रेलवे बोर्ड ने निर्धारित उप-बीट प्रभारियों के लिए अद्यतन उप-बीट पुस्तिकाएं रखना अनिवार्य कर दिया है। इन पुस्तिकाओं में रेलवे के बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों और संभावित सुरक्षा कमजोरियों से जुड़ी विस्तृत जानकारी दर्ज होगी।
रेलवे स्टेशनों पर इन अभिलेखों में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों की संख्या, उनके चालू या खराब होने की स्थिति, रोशनी की व्यवस्था, स्टॉलों की संख्या और उनके स्थान तथा ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों का विवरण शामिल होगा। रेलवे के ब्लॉक खंडों में सुरक्षा कर्मियों को संवेदनशील प्रतिष्ठानों, रेलवे सिग्नलों, रिले इंटरलॉकिंग केबिनों, चारदीवारी में बनी दरारों या टूटे हिस्सों, संवेदनशील स्थानों और उन जगहों का विवरण दर्ज करना होगा, जहां रेलवे की सामग्री रखी जाती है या बिखरी पड़ी रहती है। इन अभिलेखों में गैंगमैन, कीमैन और गेटमैन सहित रेलवे कर्मचारियों के संपर्क विवरण भी दर्ज होंगे, ताकि सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं के दौरान उनके साथ समन्वय स्थापित किया जा सके।
रेलवे बोर्ड ने निगरानी की एक व्यवस्था शुरू की है, जिसके तहत वरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्तों और मंडल सुरक्षा आयुक्तों को साल में कम से कम एक बार सभी उप-बीट और उनसे जुड़ी इकाइयों का दौरा करना होगा। इन निरीक्षणों के दौरान वरिष्ठ अधिकारी निर्धारित सुरक्षा कर्मियों से बातचीत करेंगे, उप-बीट पुस्तिकाओं की जांच करेंगे और किसी भी तरह की अनियमितता पाए जाने पर उचित कार्रवाई शुरू करेंगे। सहायक सुरक्षा आयुक्त अपने उपमंडलीय क्षेत्र में बीट संबंधी कामकाज की निगरानी करेंगे, जबकि मुख्य सुरक्षा आयुक्त और प्रधान मुख्य सुरक्षा आयुक्त निरीक्षण और समीक्षा के जरिये व्यापक स्तर पर निगरानी रखेंगे।
पोस्ट कमांडरों की जिम्मेदारी होगी कि उनके अधिकार क्षेत्र में सभी स्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह सुनिश्चित हो और कहीं भी सुरक्षा में कोई कमी या जिम्मेदारियों का दोहराव न हो। रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम, 1957 के तहत आरपीएफ कर्मियों की कानूनी जिम्मेदारियों का उल्लेख करते हुए बोर्ड ने कहा कि रेलवे की संपत्ति, यात्री क्षेत्रों और यात्रियों की सुरक्षा के लिए व्यवस्थित बीट व्यवस्था और सक्रिय सुरक्षा सतर्कता जरूरी है। ये निर्देश सभी क्षेत्रीय रेलवे के आरपीएफ संगठनों को भेजे गए हैं। इनमें रेलवे सुरक्षा विशेष बल, कोंकण रेलवे और कोलकाता मेट्रो के साथ-साथ उत्पादन इकाइयां और क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र भी शामिल हैं।

