अमेरिकी सीनेट के चुनाव में अब्दुल अल-सैयद और माइक रोजर्स के बीच कड़ा मुकाबला

वाशिंगटन, 02 नवंबर (वार्ता) अमेरिका के मिशिगन राज्य में अमेरिकी सीनेट की सीट के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल-सईद और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार माइक रोजर्स के बीच कड़ा मुकाबला चल रहा है।

यह चुनाव अमेरिकी मध्यावधि चुनावों का हिस्सा है और इससे यह तय होगा कि सीनेट में किस पार्टी का बहुमत होगा। मंगलवार को होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद अमेरिकी सीनेट पर किसका नियंत्रण होगा, यह मिशिगन के नतीजों पर निर्भर कर सकता है। 63 वर्षीय रोजर्स के सामने एक बड़ी चुनौती है कि क्या एक रिपब्लिकन उम्मीदवार महंगाई, अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की गिरती लोकप्रियता (अप्रूवल रेटिंग) को लेकर मतदाताओं की नाराजगी से पार पा सकेगा? वहीं, 42 वर्षीय अल-सैयद के लिए भी सवाल उतना ही अहम है कि क्या उनका साहसिक प्रगतिशील एजेंडा आम अमेरिकियों को पसंद आएगा या उनका महत्वाकांक्षी विजन ‘मिडिल अमेरिका’ (मध्यम-मार्गी अमेरिकी समाज) के लिए कुछ ज्यादा ही वामपंथी साबित होगा? मिस्र से आए प्रवासियों के बेटे अब्दुल अल-सैयद ने शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता से लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य नेतृत्व और राजनीति तक एक अलग ही रास्ता तय किया है।

रोड्स स्कॉलर और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले अल-सैयद चुनावी राजनीति में आने से पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़े थे। उनकी राजनीतिक यात्रा ने तब रफ्तार पकड़ी, जब उन्होंने मिशिगन के डेमोक्रेटिक प्राथमिक चुनाव में एक मध्यम-मार्गी प्रतिद्वंद्वी को बहुत कम अंतर (एक प्रतिशत से भी कम) से हराया।

अब उनका लक्ष्य एक बड़ी जीत हासिल करना है-रिपब्लिकन माइक रोजर्स को हराना और साथ ही डेमोक्रेटिक पार्टी को एक अधिक प्रगतिशील राजनीतिक दिशा की ओर ले जाना। श्री अल-सैयद के चुनाव अभियान के केंद्र में एक व्यापक बदलाव का वादा है। उनके एजेंडे में कॉरपोरेट एकाधिकार को खत्म करना, सबके लिए ‘मेडिकेयर’ (स्वास्थ्य सेवा प्रणाली) लागू करना और इज़राइल पर हथियारों की बिक्री पर रोक लगाना शामिल है। उनका संदेश साफ है- छोटे-मोटे बदलाव काफी नहीं हैं। वे अमेरिका की आर्थिक, स्वास्थ्य और विदेश नीतियों में बुनियादी बदलाव चाहते हैं। श्री अल-सैयद का नाम अक्सर ‘अमेरिका के लोकतांत्रिक समाजवादी’ के साथ जोड़ा जाता है लेकिन वे इसके सदस्य नहीं हैं और खुद को इस लेबल से दूर ही रखते हैं। श्री अल-सैयद ने कहा, “मैं एक पूंजीवादी हूं, जो यह मानता है कि देश में हर किसी को स्वास्थ्य सेवा की गारंटी मिलनी चाहिए। जो लोग इसे पूंजीवाद-विरोधी बताते हैं, वे असल में यह नहीं समझते कि पूंजीवाद कैसे काम करता है।”

लेकिन मतदाता उनके इस संकल्प को अपनाते हैं या नहीं, यह न केवल उनके राजनीतिक भविष्य को तय करेगा बल्कि अमेरिकी सीनेट में सत्ता के संतुलन को भी प्रभावित करेगा। श्री माइक रोजर्स अमेरिका के मिशिगन राज्य के एक रिपब्लिकन राजनेता हैं, जो अमेरिकी सीनेट की एक सीट के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। मिशिगन सीनेट की इस सीट के लिए उनका मुकाबला डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद से है, जिस पर सबकी नजरें टिकी हैं। वे अमेरिकी सेना के पूर्व अधिकारी, एफबीआई एजेंट और कांग्रेस सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने 14 वर्षों (2001-2015) तक ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ (अमेरिकी प्रतिनिधि सभा) में मिशिगन का प्रतिनिधित्व किया है। उनके चुनाव प्रचार का मुख्य संदेश है- ‘पहले मिशिगन, फिर वाशिंगटन की राजनीति।’ उनका प्रचार अभियान छह मुख्य मुद्दों पर केंद्रित है। इनमें शिक्षा और साक्षरता प्रमुख हैं- श्री रोजर्स बच्चों के पढ़ने-लिखने के कौशल को बेहतर बनाना चाहते हैं। उनका तर्क है कि साक्षरता की कमी के कारण युवा न केवल सैन्य सेवा के लिए अयोग्य हो रहे हैं बल्कि जीवन में सफल होने में भी उन्हें कठिनाई आ रही है। वे मिशिगन के कामगारों, परिवारों और व्यवसायों को प्राथमिकता देने का वादा करते हैं, खासकर फ्लिंट जैसे समुदायों के लिए।

यहां एक दिलचस्प बात यह है कि रिपब्लिकन होने के बावजूद श्री रोजर्स कनाडा पर लगाए गए ट्रम्प के टैरिफ (आयात शुल्क) से असहमत हैं। उनका मानना है कि इससे मिशिगन की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच रहा है। उनका कहना है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे टैरिफ के मुद्दे पर राष्ट्रपति के फैसले को पलटने के प्रयासों का समर्थन करेंगे। वे एक यहूदी राष्ट्र के रूप में इज़राइल के अस्तित्व और अपनी रक्षा करने के अधिकार का पुरजोर समर्थन करते हैं। वे श्री अल-सैयद के उस बयान का विरोध करते हैं, जिसमें उन्होंने गाजा में इज़राइल की कार्रवाई को नरसंहार करार दिया था। श्री रोजर्स एफबीआई एजेंट के रूप में अपने अनुभव का हवाला देते हुए खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं, जिसे संगठित अपराध और सार्वजनिक भ्रष्टाचार से निपटने का अनुभव है।

वे मुख्य रूप से अफ्रीकी-अमेरिकी आबादी वाले इलाकों में प्रचार कर रहे हैं। वे मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि डेमोक्रेट्स ने उनके समर्थन को ‘पक्का’ मान लिया है (यानी उन्हें लगता है कि ये लोग तो उन्हें ही वोट देंगे)। श्री डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उनके संबंध रोजर्स के चुनाव प्रचार के सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलुओं में से एक हैं। श्री ट्रम्प ने श्री रोजर्स का समर्थन किया है। टैरिफ के मुद्दे पर खासकर कनाडा के साथ व्यापार को प्रभावित करने वाले टैरिफ पर श्री रोजर्स ने सार्वजनिक रूप से श्री ट्रम्प से असहमति जताई है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि वे टैरिफ नीति को लेकर राष्ट्रपति को चुनौती देने के लिए तैयार हैं। श्री ट्रम्प से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दों पर श्री रोजर्स ने प्रशासन की सीधी आलोचना करने से परहेज किया है। उनका कहना है कि वे तथ्यों के आधार पर ही किसी मामले पर अपनी राय बनाएंगे।

मिशिगन में इज़राइल-फिलिस्तीन मुद्दा काफी अहमियत रखता है क्योंकि यहां अरब-अमेरिकी आबादी और यहूदी मतदाताओं की एक बड़ी संख्या है। ये दोनों समूह चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। श्री रोजर्स ने श्री अल-सैयद पर एक ऐसा माहौल बनाने का आरोप लगाया है, जो यहूदी-विरोध को बढ़ावा देता है। चुनाव 3 नवंबर, 2026 को होने हैं। श्री रोजर्स डेमोक्रेटिक पार्टी के कब्जे वाली सीनेट सीट को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहे हैं। इस सीट पर अभी सीनेटर गैरी पीटर्स हैं, जो अवकाशप्राप्त करने वाले हैं। इस चुनाव के नतीजे तय कर सकते हैं कि अमेरिकी सीनेट पर किस पार्टी का नियंत्रण होगा।

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