
प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली, दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान महज़ एक जनसभा का गवाह नहीं बना, बल्कि उसने उस नए राजनीतिक नैरेटिव को जन्म दिया है जिसने विपक्षी एकजुटता की बिसात पर एक नया और बेहद दिलचस्प अध्याय जोड़ते हुए आंदोलन की दशा और दिशा दोनों बदल दी है.
राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि आंदोलन का सबसे प्रखर चेहरा होने के बावजूद, राहुल गांधी ने व्यक्तिगत वर्चस्व के पारंपरिक चक्रव्यूह को तोड़कर सामूहिक नेतृत्व की एक ऐसी व्यावहारिक अवधारणा को आगे बढ़ाया है, जिसने सहयोगियों के अविश्वास को भरोसे में बदल दिया. कांग्रेस रणनीतिकारों द्वारा अपने पूर्व-निर्धारित कार्यक्रमों को दरकिनार कर जिस तरह की रणनीति अपनाई गई है वह भारतीय लोकतंत्र में एक व्यापक और दूरगामी रणनीतिक बदलाव का संकेत है.
कहा जा रहा है कि सामूहिकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्रमाणित करने के लिए कांग्रेस ने कई पूर्व-निर्धारित योजनाओं को बदल दिया. पहले से तय रणनीति के तहत रामलीला मैदान की रैली से राहुल गांधी एक बड़ी लड़ाई का आगाज़ करने वाले थे और सर्वसम्मति बनने पर रैली की समाप्ति के बाद गांधीवादी तरीके से उपवास पर बैठने वाले थे. लेकिन गठबंधन की एकता को सर्वोपरि रखते हुए इस योजना को टाल दिया गया, ताकि संदेश किसी एक व्यक्ति के बजाय पूरे विपक्ष के साझा संकल्प का जाए.
कांग्रेस की नीतियों में आए इस रणनीतिक बदलाव के पीछे हाल की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं कारण व कारक बनी हैं. क्योंकि पूर्व में जब चुनाव आयुक्त से मिलने के लिए विपक्षी दलों का सामूहिक मार्च निकाला गया था, तब कुछ ऐसी परिस्थितियां बनीं जिससे गठबंधन के भीतर आंतरिक मतभेदों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी. मार्च के दौरान कई सहयोगी दलों के नेताओं को पहले गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अलग से आकाशवाणी भवन परिसर में मोर्चा संभाला और बाद में लंच डिप्लोमेसी के बाद जंतर-मंतर जाने के क्रम में भी वे अकेले आगे बढ़ते दिखे. इस घटनाक्रम के बाद से सहयोगी दलों में यह संदेश गया कि कांग्रेस खुद को इस पूरे आंदोलन के केंद्र में रख रही है. जिसके कारण सहयोगियों के रूख में अचानक बदलाव आने लगा. संभवतः इस सुगबुगाहट को भांपकर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने तुरंत अपनी रणनीति में व्यापक सुधार किया.
राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि इस बदली हुई रणनीति और लचीले रुख का सकारात्मक परिणाम गठबंधन के भीतर आपसी तालमेल के रूप में दिखाई देने लगा है. क्योंकि रामलीला मैदान के मंच से तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा सोनिया गांधी को हमारी नेता के रूप में संबोधित करना और अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों द्वारा राहुल गांधी के जुझारूपन की सराहना करना इसी सामूहिकता का प्रमाण है. रैली में विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं ने न केवल एक-दूसरे के प्रति सम्मान व्यक्त किया, बल्कि मंच से इस बात को भी पुष्ट किया कि यह लड़ाई किसी एक दल की महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि साझा लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने का सामूहिक प्रयास है. ऐसे में कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने अपने कदम एक पायदान पीछे खींचकर न सिर्फ इंडिया गठबंधन और नागरिक समाज के विभिन्न प्रतिनिधियों को एक साझा मंच पर लाने में सफलता हासिल कर ली है बल्कि सामूहिकता के मंत्र के सहारे भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सामने एक मजबूत और संगठित विरोधी समूह खड़ा कर दिया है. जिसके कारण आंदोलन सिर्फ कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई तक सीमित न रहकर आम जनता और संपूर्ण गैर-राजग समूह की साझा वैचारिक लड़ाई में तब्दील हो गया है.
