इंदौर-दाहोद रेल लाइन : झाबुआ से धार के बीच सुस्त चाल, 63 किलोमीटर का काम अब भी अधर में लटका

झाबुआ. इंदौर से दाहोद रेल लाइन परियोजना का शुभारंभ वर्ष 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव एवं प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की उपस्थिति में झाबुआ के हरिभाई की बावड़ी नामक स्थान पर किया गया था। इस ऐतिहासिक अवसर पर करीब एक लाख आदिवासी लोग उपस्थित थे। उस समय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा था कि इस रेल परियोजना से तीन वर्षों में आदिवासी जिले की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल जाएंगी। इसी अवसर पर झाबुआ के साथ-साथ छोटा उदयपुर से आलीराजपुर होते हुए धार तक रेल लाइन की सौगात भी दी गई थी।

वर्ष 2008 से 2026 तक के सफर में छोटा उदयपुर-आलीराजपुर-धार रेल लाइन परियोजना का काम अब अंतिम पड़ाव की ओर पहुंचता दिखाई दे रहा है। वर्तमान में छोटा उदयपुर से आलीराजपुर और आलीराजपुर से जोबट, डेकाकुंड, बाग एवं कुक्षी क्षेत्र तक रेल लाइन का काम आगे बढ़ रहा है। उम्मीद है कि शीघ्र ही यह रेल लाइन धार तक जुड़ जाएगी।

इसी तरह इंदौर से धार तक रेल लाइन का काम भी लगभग पूरा हो चुका है। नवंबर-दिसंबर तक इंदौर से धार के बीच पटरी पर रेल दौड़ती दिखाई दे सकती है। इसके लिए ट्रायल रन की प्रक्रिया चल रही है। वहीं दाहोद से झाबुआ तक भी जनवरी 2027 तक रेल संचालन शुरू करने की तैयारी की जा रही है।

लेकिन दूसरी ओर झाबुआ से धार के बीच लगभग 63 किलोमीटर का रेल मार्ग आज भी अधर में लटका हुआ है। स्थिति यह है कि इस हिस्से में अभी तक जमीन का अधिग्रहण तक नहीं हुआ है और न ही रेल लाइन निर्माण से संबंधित कोई ठोस काम शुरू हो पाया है। ऐसे में इंदौर-दाहोद रेल लाइन परियोजना के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे है।

झाबुआ से धार के बीच रेल लाइन के ट्रैक को लेकर बार-बार नक्शों में बदलाव किया जा रहा है। पहले खरमोर पक्षी के लिए अधिसूचित क्षेत्र के कारण रेल मार्ग को मंजूरी नहीं मिल पाई। अब इस ट्रैक को मोहनखेड़ा से निकालने की चर्चा सामने आ रही है। इसके लिए नए सर्वे और नक्शे को मंजूरी मिलने का इंतजार है। इसके साथ ही जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू नहीं हो सकी है। दोनों आदिवासी जिलों के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई देने से परियोजना की गति पर सवाल खड़े हो रहे है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आजादी के इतने वर्षों बाद भी झाबुआ और धार के बीच रेल लाइन बिछ पाएगी या नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि आदिवासी अंचल के लोगों को इंदौर से धार और दाहोद से झाबुआ तक अलग-अलग रेल लाइनें बनाकर बीच का महत्वपूर्ण हिस्सा अधूरा छोड़ दिया जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो आदिवासी क्षेत्र के लोगों को इस महत्वाकांक्षी परियोजना का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा। उनके लिए यह रेल सुविधा अधूरी साबित होगी।

रेल लाओ महासमिति झाबुआ-धार-आलीराजपुर के जिला संयोजक दिलीप सिंह वर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर इस महत्वपूर्ण रेल परियोजना को गति देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि आदिवासी अंचल की इस महत्वपूर्ण रेल लाइन को टुकड़ों में बांटकर क्षेत्र के लोगों को झुनझुना थमाने के बजाय पूरी परियोजना पर एक साथ और तीव्र गति से काम किया जाना चाहिए। बार-बार सर्वे कराने तथा रेल लाइन के मार्ग में परिवर्तन करने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए, ताकि निर्माण कार्य में अनावश्यक देरी न हो।

वर्मा ने कहा कि क्षेत्र के लोगों को सरकार पर भरोसा है, लेकिन इस परियोजना के लिए पहले ही बहुत लंबा इंतजार किया जा चुका है। यदि अब भी झाबुआ से धार के बीच रेल लाइन के निर्माण को लेकर इसी तरह उदासीनता बनी रही, तो एक बार फिर धार और झाबुआ के लोगों को अपने हक के लिए आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ेगा।

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