न कोई पंजीकरण और न किसी जांच का डर। शहर में आरओ वाटर के नाम पर लाखों कमाने का धंधा हर गली -कालोनी में चल रहा है। आश्चर्य की बात ये है कि इस धंधे पर न तो किसी विभाग की निगरानी है और न ही कोई जांच करने की प्रक्रिया। जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि इस संबंध में कोई नियम ही नहीं है तो जांच कैसे करें। सवाल है कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य को किसके भरोसे छोड़ रखा है। शहर में पानी का 4 से 5 करोड़ रुपए रोज का व्यापार होता है। पानी बेचने वाले जल माफियाओं को खर्च 3 से 4 प्रतिशत आता है, यानि 95 प्रतिशत लाभ का धंधा ?
जानकारों के अनुमान के अनुसार शहर में 700 से 800 पानी के प्लांट चल रहे है, जिनमें से सिर्फ 47 कंपनियों ने खाद्य एवं औषधि विभाग से लाइसेंस लिया है। बाकी सब अवैध रूप से पानी बेचने का धंधा कर रहे है। कई गली मोहल्लों और बाहरी क्षेत्रों में ऐसे है, जिनके पास गुमास्ता का लाइसेंस भी नहीं है। शहर में पानी का धंधा करने वाला जल माफिया अवैध नर्मदा नल कनेक्शन और बोरिंग का पानी धड़ल्ले से बेच रहे हैं। खास बात यह है कि पानी जांच रिपोर्ट बिना ही सीधे आरओ प्लांट लगाकर 2 दो सौ मिलीलीटर से 20 लीटर के जार में आरओ और मिनरल वाटर के नाम पर लाखों कमा रहे है।
औपचारिकता के नाम पर नगर निगम और गुमास्ता का लाइसेंस नाममात्र के शुल्क पर आसानी से उपलब्ध है। आरओ वाटर के नाम पर 20 लीटर पानी का एक जार इलाके के हिसाब से 30 से 50 रुपये में बेचा जाता है। सरकारी तंत्र स्वीकार करता है कि पानी कैसे और कैसा भी बेचा जा रहा हो, हम कोई कार्रवाई करने में सक्षम नहीं। मतलब साफ है कि आरओ वाटर हो या आरओ वाटर के नाम पर गंदा पानी। कोई जांच होगी ही नहीं। इसके बाद लोग बीमार हों या उनके साथ हो कोई अनहोनी। विभाग की कोई जिम्मेदारी ही नहीं है। खाद्य विभाग के अधिकारी मनीष स्वामी कहते हैं कि पैक्ड वाटर के सैंपल लेने के अधिकार विभाग के पास हैं, लेकिन खुला या आरओ प्लांट वाले पानी की जांच करने का कोई नियम नहीं है।
पलास्टिक टैंक से घरों में सप्लाई
नवभारत की जांच में सामने आया कि वाहनो में 500 से 1000 लीटर के पलास्टिक टैंक रखकर उनके माध्यम से गली मौहल्लों में सप्लाई की जा रही है। इन टैंक की सफाई कब कराई गयी थी, सप्लाई करने वालों को भी नहीं याद। इसके अलावा कैंपर की सफाई भी नहीं होती। सीधे पानी भरकर घरों और प्रतिष्ठानों में पहुंचाया जा रहा है। गैस्ट्रो सर्जन डॉ. राकेश शिवहरे बताते हैं कि गंदे कैंपर, जार या टैंक से पानी सप्लाई से टायफाइड, हैपेटाइटिस का खतरा बढ़ जाता है, जिससे मल्टी आर्गन फैलियर हो सकते हैं और जान भी जा सकती है।
