200 किमी लंबी नहरें, सफाई के नाम पर हो रही महज खानापूर्ति

एसके चौहान रेहटी। रबी सीजन में फसलों की सिंचाई के लिए किसान नहरों के पानी पर निर्भर हैं, लेकिन कोलार परियोजना की करीब 200 किलोमीटर लंबी नहरों में सफाई की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं.

परियोजना से 20,835 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होती है. इसके बावजूद कई स्थानों पर नहरें घास, झाडिय़ों और कचरे से घिरी हैं. कुछ जगह नहरों की पहचान करना भी मुश्किल हो रहा है. विभाग एक नवंबर से पानी छोडऩे की तैयारी कर रहा है, लेकिन किसान चिंतित हैं कि अधूरी सफाई और क्षतिग्रस्त नहरों के कारण उन्हें पानी मिल पाएगा या नहीं.

कोलार परियोजना उप संभाग क्र.14 की बाईं मुख्य नहर और उससे जुड़ी वितरिकाओं के कई हिस्सों में घास, झाडिय़ां और कचरा जमा है. किसानों का आरोप है कि हर साल सफाई के नाम पर औपचारिकता निभाई जाती है. मलबा नहीं हटाया जाता और क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत भी नहीं होती. इससे पानी का रिसाव होता है, जिसका असर खेतों पर पड़ता है. अंतिम छोर के किसानों को पर्याप्त पानी के लिए इंतजार करना पड़ता है. विभागीय जानकारी के अनुसार, 20,835 हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था के लिए प्रति हेक्टेयर 100 रुपए के हिसाब से सफाई बजट 20 लाख 83 हजार 500 रुपए ह. एसडीओ एसएस मेहर के अनुसार, जब यह दर तय हुई थी, तब मजदूरी करीब 100 रुपए थी, जबकि अब मजदूरी लगभग 400 रुपए हो गई है. इतनी राशि में मजदूरों की व्यवस्था, सफाई और जेसीबी का खर्च निकालना मुश्किल है. माजरकुई के किसान दिनेश साहू का कहना है कि हर साल सफाई होती है, लेकिन नहरों की हालत में खास बदलाव नजर नहीं आता. कई जगह मलबा और झाडिय़ां बनी रहती हैं, जबकि टूटी नहरों से पानी बर्बाद होता है. मर्दानपुर के किसान केशवगिरी के अनुसार उनके खेत तक पानी पहुंचने में इतनी देर हो जाती है कि नहर बंद होने का समय नजदीक आ जाता है. मजबूरी में ट्यूबवेल से सिंचाई करनी पड़ती है. नहर में घास और कचरा जमा होने से पहचान करना भी मुश्किल है.

 

 

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