नयी दिल्ली, 11 अक्टूबर (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को वरिष्ठ राजनीतिक नेता और समाज सुधारक नानाजी देशमुख को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने राष्ट्र-निर्माण में देशमुख के योगदान और ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भरता तथा सामुदायिक भागीदारी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को याद किया।
श्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में देशमुख को एक “असाधारण राष्ट्र-निर्माता” बताया, जिन्होंने अपने विचारों और कार्यों से यह दिखाया कि “असली बदलाव ज़मीनी स्तर से शुरू होता है”। उन्होंने कहा कि देशमुख का जीवन राजनीतिक दृढ़ता और रचनात्मक सामाजिक कार्यों का संगम था, जिसमें ग्रामीण विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण पर लगातार ध्यान दिया गया।
प्रधानमंत्री ने कहा, “हम एक मज़बूत और आत्मनिर्भर भारत के उनके विज़न को साकार करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।” उन्होंने ज़मीनी स्तर पर बदलाव और भागीदारीपूर्ण विकास पर देशमुख के विचारों की प्रासंगिकता को फिर से रेखांकित किया।
ग्यारह अक्टूबर 1916 को जन्मे देशमुख भारतीय जनसंघ के एक प्रमुख नेता के रूप में उभरे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से गहराई से जुड़े रहे। उन्होंने जनसंघ के संगठनात्मक नेटवर्क को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े।
वे उन राजनीतिक नेताओं में भी शामिल थे जिन्होंने 1975 से 1977 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का विरोध किया था और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग करने वाले व्यापक आंदोलन में हिस्सा लिया था।
बाद में श्री देशमुख ने अपना ज़्यादातर जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया और ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आजीविका के साधन जुटाने पर ध्यान केंद्रित किया। उनका मानना था कि टिकाऊ विकास केवल सरकारी मदद से हासिल नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण ज़रूरी है।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में चित्रकूट में उनके काम ने एकीकृत ग्रामीण विकास के प्रति उनके नज़रिए का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया। खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोज़गार के मौकों को बेहतर बनाने के लिए शुरू की गई पहलों के ज़रिए, उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि कैसे गाँव स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक भागीदारी का इस्तेमाल करके जीवन स्तर को बेहतर बना सकते हैं और बाहरी मदद पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
इस सोच को आगे बढ़ाने के लिए श्री देशमुख ने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की, जिसने ग्रामीण बदलाव, कृषि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और टिकाऊ आजीविका से जुड़े कार्यक्रमों पर काम किया। उनके मॉडल में स्थानीय समस्याओं के व्यावहारिक समाधान, सामुदायिक संसाधनों को जुटाने और विकास की योजनाओं को बनाने और लागू करने में ग्रामीणों की भागीदारी पर ज़ोर दिया गया।
सार्वजनिक जीवन और सामाजिक विकास में देशमुख के योगदान को 1999 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 2019 में देश के प्रति उनकी सेवा के सम्मान में उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया गया।
देशमुख की जयंती पर श्री मोदी की श्रद्धांजलि ने एक ऐसी विकास सोच की ओर फिर से ध्यान खींचा, जिसमें गांवों और स्थानीय समुदायों को राष्ट्र-निर्माण के केंद्र में रखा गया था। आत्मनिर्भरता, ज़मीनी स्तर पर सशक्तिकरण और सामूहिक भागीदारी पर उनका ज़ोर आज भी ग्रामीण बदलाव और समावेशी विकास पर होने वाली चर्चाओं में अहम बना हुआ है, खासकर तब जब भारत ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करने और ज़रूरी सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
