
ग्वालियर। एक निजी कार्यक्रम की सजावट के लिए रंगीन पर्दे टांग दिए गए, पंडाल खड़ा कर दिया गया, लेकिन इस आयोजन की कीमत पार्क के हरे-भरे पेड़ो को चुकानी पड़ी। थाटीपुर की नेहरू कॉलोनी स्थित नेहरू पार्क में पेड़ों की विशाल शाखाएं जमीन पर बिखरी हैं और पास ही कार्यक्रम के लिए लगाया गया पंडाल नजर आ रहा है। मौके की तस्वीर एक ऐसा सवाल खड़ा करती है, जिसका जवाब नगर निगम और संबंधित जिम्मेदारों को देना चाहिए, क्या कुछ दिनों के आयोजन के लिए वर्षों में तैयार हुई हरियाली को मिटा देना जरूरी था?
स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार, पार्क में एक कार्यक्रम आयोजित किया जाना है। आरोप है कि पंडाल लगाने के लिए करीब 25 साल पुराने पेड़ों को काट दिया गया। यदि पेड़ की कटाई आयोजन के लिए जगह बनाने के उद्देश्य से की गई है, तो यह जांच का विषय है कि क्या इसकी अनुमति ली गई थी और क्या पेड़ को बचाते हुए पंडाल लगाने का कोई विकल्प नहीं था। सार्वजनिक पार्क में पेड़ की कटाई ने पर्यावरण संरक्षण के दावों और हरियाली की सुरक्षा के इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
25 साल की हरियाली, कुछ पलों में जमीन पर
नवभारत प्रतिनिधि से स्थानीय निवासियों ने अपना दर्द साझा कर बताया कि उन्होंने इन पेड़ों को करीब 25 वर्षों में बढ़ते हुए देखा है। दशहरा, दिवाली और होली जैसे अवसरों पर कॉलोनी के लोग इसी स्थान पर जुटते रहे हैं। गर्मियों में शाम के समय यही पेड़ छांव देते थे। उनके लिए यह केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि कॉलोनी के सार्वजनिक जीवन और आसपास के वातावरण का हिस्सा था। अब इसकी कटाई से पार्क की हरियाली को नुकसान पहुंचा है।रामनाथ का कहना है कि कार्यक्रम आयोजित करने पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन उसके लिए हरे-भरे पेड़ को काट देना समझ से परे है। आयोजन की व्यवस्था बदली जा सकती थी, पंडाल की जगह बदली जा सकती थी, लेकिन एक बार गिरा दिया गया वयस्क पेड़ तत्काल वापस नहीं आ सकता।
पंडाल की सजावट के बीच पेड़ की उजड़ी छांव
मौके की तस्वीर में एक ओर रंगीन कपड़ों से सजा पंडाल दिखाई दे रहा है, तो दूसरी ओर जमीन पर पड़ी पेड़ की भारी शाखाएं। यह दृश्य आयोजन की तैयारी और पर्यावरण को हुए नुकसान के बीच का अंतर साफ दिखाता है। जिस सार्वजनिक जगह का उपयोग कॉलोनी के लोग करते हैं, वहां पेड़ की कटाई का असर केवल हरियाली तक सीमित नहीं रहता, छांव, पर्यावरण संरक्षण स्थानीय वातावरण और पार्क की प्राकृतिक सुंदरता भी प्रभावित होती है। यदि आयोजन की अनुमति दी गई है, तो क्या उसमें पेड़ों की सुरक्षा की शर्त शामिल थी? और यदि पेड़ बिना अनुमति काटा गया, तो निगरानी करने वाले जिम्मेदारों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?
नए पौधे लगाने का संदेश, बड़े पेड़ों की सुरक्षा कौन करेगा?
शहर में पौधारोपण अभियानों के माध्यम से लोगों को पर्यावरण बचाने का संदेश दिया जाता है। लेकिन पर्यावरण संरक्षण की असली परीक्षा पहले से मौजूद पेड़ों को बचाने में है। पौधा लगाना जरूरी है, मगर वर्षों से खड़े वयस्क पेड़ को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है। उसकी जगह नया पौधा लगा देने से तत्काल वही छांव और पर्यावरणीय लाभ नहीं मिल सकते।
यह सवाल गरमाए, जिनके जवाब जरूरी
कॉलोनी के पर्यावरण प्रेमियों ने मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है। जरूरत पड़ने पर ज्ञापन और प्रदर्शन किए जाने की बात भी कही गई है। उनका सवाल है कि जब सार्वजनिक स्थानों पर हरियाली बचाने की जिम्मेदारी प्रशासन की है, तो ऐसे मामलों में जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
पार्क से संबंधित अधिकारी ने बताया कि फिलहाल उन्हें मामले की जानकारी नहीं मिली है। जानकारी मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन केवल जानकारी जुटाने तक सीमित रहता है या मौके का निरीक्षण कर पेड़ की कटाई की परिस्थितियों, अनुमति और जिम्मेदार व्यक्तियों की भी जांच करता है। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि पेड़ काटने की अनुमति किस विभाग ने दी, यदि दी गई तो किन आधारों पर दी गई और क्या पेड़ बचाने के विकल्पों पर विचार हुआ था। यदि बिना अनुमति कटाई की पुष्टि होती है, तो संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही पार्क में शेष पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत है।
