इस्लामाबाद, पाकिस्तान में आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक कसने तथा सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए एक बेहद बड़ा और चौंकाने वाला प्रस्ताव सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने देश को 12 से 15 नए प्रांतों या लगभग 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित करने का एक आधिकारिक प्रस्ताव पेश किया है। वर्तमान में पाकिस्तान में केवल चार प्रमुख प्रांत—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान मौजूद हैं। इस नए प्रस्ताव के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि देश के सबसे बड़े राज्य पंजाब, जहां कुल आबादी का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है, वहां ग्रामीण इलाकों तक मूलभूत सरकारी सुविधाएं और साफ पानी समय पर नहीं पहुंच पा रहा है, जिसके चलते प्रशासनिक सुधार बेहद जरूरी हो गए हैं।
सत्ता का संतुलन साधने और केंद्र की ताकत बढ़ाने की रणनीति, पंजाब और सिंध पर पड़ेगा सबसे बड़ा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि आसिम मुनीर का यह कदम केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए देश की सत्ता और राजनीतिक संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की जा रही है। यदि इस प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाया जाता है, तो इससे बनने वाले नए प्रांत केंद्र सरकार और सेना के प्रति अधिक निर्भर हो जाएंगे, जिससे विद्रोही सुरों और राजनीतिक असंतोष को दबाना आसान हो जाएगा। इस विभाजन का सबसे सीधा असर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन के मुख्य गढ़ माने जाने वाले पंजाब और सिंध प्रांतों पर पड़ेगा, जहां लाहौर, कराची और रावलपिंडी जैसे बड़े और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शहर स्थित हैं।
खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और पीओके में कड़े विरोध के आसार, इमरान खान की पार्टी और स्थानीय विद्रोहियों से मिल सकती है कड़ी चुनौती
हालांकि, सेना और सरकार के लिए इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं होगा क्योंकि खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे प्रांतों में पहले से ही भारी उथल-पुथल मची हुई है। खैबर पख्तूनख्वा को पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पीटीआई का मजबूत गढ़ माना जाता है, जहां तख्तापलट के बाद से ही सैन्य शासन के खिलाफ तीखा विरोध देखने को मिल रहा है। इसके अलावा, बलूचिस्तान में स्वतंत्रता की मांग कर रहे विद्रोही समूहों और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में लगातार बढ़ रहे आर्थिक असंतोष के बीच क्षेत्रों का यह नया परिसीमन पाकिस्तान सरकार और सेना के लिए एक भारी राजनीतिक संकट साबित हो सकता है।

