खाली कुर्सियां खोल रही नगर परिषद की पोल, जनता से कटी परिषद!

पेटलावद. नगर परिषद पेटलावद में आयोजित शिविर में नजर आई खाली कुर्सियों ने नगर परिषद की कार्यप्रणाली और आम जनता से उसके जुड़ाव पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जनता की सुविधा और समस्याओं के समाधान के नाम पर आयोजित शिविर में जब जनता ही नजर नहीं आई तो आयोजन की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। स्थिति यह रही कि शिविर स्थल पर कुर्सियां खाली पड़ी रहीं और कुछ अधिकारी-कर्मचारी ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराते नजर आए।

 *जनता नहीं पहुंची या जनता तक नहीं पहुंचा परिषद का संदेश?* 

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि नगर परिषद को जनता के लिए शिविर आयोजित करना था तो आम नागरिकों तक इसकी जानकारी और उसका संदेश प्रभावी ढंग से क्यों नहीं पहुंचा? और यदि जानकारी दी गई थी तो जनता ने शिविर से दूरी क्यों बनाए रखी? दोनों ही परिस्थितियां नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

शिविर में कई पार्षदों की गैरमौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी रही। जिन जनप्रतिनिधियों को अपने वार्ड की जनता के बीच रहकर उनकी समस्याएं उठानी चाहिए, उनकी ही आयोजन में अनुपस्थिति जनता के साथ जुड़ाव पर सवाल खड़े करती दिखाई दी।

 *सोशल मीडिया की सक्रियता बनाम जमीन पर सन्नाटा* 

नगर में अब यह चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है कि जनप्रतिनिधियों की सक्रियता का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया तक सिमटता जा रहा है। रील और प्रचार से राजनीति चमकाने की कोशिशों के बजाय जनता के बीच पहुंचकर उनकी समस्याएं सुनने और उनका समाधान कराने की जरूरत है। जनता को सोशल मीडिया की तस्वीरें नहीं, बल्कि सड़क, सफाई, प्रकाश व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं में बदलाव चाहिए।

*नए चेहरों को मौका, लेकिन उम्मीदों पर खरे नहीं उतरने की चर्चा* 

वर्तमान परिषद को नगर की जनता ने नए और युवा चेहरों के साथ इस उम्मीद में अवसर दिया था कि नगर के विकास में नई सोच और नई कार्यशैली देखने को मिलेगी। स्वच्छता, सुंदरता, मूलभूत सुविधाओं और नगर विकास को लेकर लोगों को बड़ी अपेक्षाएं थीं। लेकिन अब आम नागरिकों के बीच यह चर्चा होने लगी है कि परिषद अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम देने में सफल नहीं हो पा रही है।

जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जब परिषद के आयोजनों में ही जनता की भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पा रही है तो फिर जनता और परिषद के बीच संवाद की स्थिति क्या है

 *रस्म अदायगी से नहीं बदलेगी नगर की तस्वीर* 

नगर परिषद को यह समझना होगा कि केवल शिविर आयोजित कर देना, फोटो खिंचवा लेना या सोशल मीडिया पर गतिविधियां प्रदर्शित कर देना ही जनसेवा नहीं है। जनप्रतिनिधियों को वार्डों में पहुंचकर जनता की समस्याएं सुननी होंगी और अधिकारियों को उन समस्याओं के समाधान के लिए जवाबदेही तय करनी होगी।

खाली कुर्सियां केवल एक शिविर की तस्वीर नहीं, बल्कि जनता और नगर परिषद के बीच बन रही दूरी का संकेत भी मानी जा रही हैं। अब देखना यह है कि परिषद इस तस्वीर से सबक लेती है या आने वाले आयोजनों में भी यही खाली कुर्सियां उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती रहेंगी।

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