विदिशा:आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से पढ़ाई करने वाले पराग अग्रवाल ने जब गांव की गलियों में गोबर की बर्बादी देखी, तो उनके मन में कुछ अलग करने की ललक जगी। उन्होंने कॉर्पोरेट करियर छोड़कर गांव लौटने का फैसला किया और अब गोबर जैसे बेकार समझे जाने वाले संसाधन से आदिवासी महिलाओं की जिंदगी बदल रहे हैं। उनके इस मिशन का नाम है ‘पालन’।पराग अग्रवाल का एनजीओ ‘पालन’ आज एक खामोश मगर प्रभावशाली क्रांति का प्रतीक बन चुका है।
इस पहल से अब तक 130 से अधिक आदिवासी महिलाएं जुड़ चुकी हैं, जो गोबर से सजावटी वस्तुएं और सुगंधित धूपबत्ती जैसे उत्पाद बना रही हैं। ये उत्पाद दिल्ली, गुजरात और राजस्थान जैसे बड़े बाजारों तक पहुंच रहे हैं, जिससे इन महिलाओं की आजीविका और आत्मविश्वास दोनों को नया आधार मिला है।यह सफर 2021 में शुरू हुआ जब पराग महज 15 दिन की छुट्टी पर अपने गांव लौटे थे। लेकिन गांव की ज़मीनी सच्चाइयों और संभावनाओं ने उन्हें वापस लौटने नहीं दिया। उन्होंने सात गांवों की महिलाओं को जोड़कर उन्हें प्रशिक्षण देना शुरू किया।
पराग ने गोबर की गंध को सबसे बड़ी चुनौती माना, जिसे कम करने के लिए उन्होंने विशेष प्रक्रिया अपनाई। पहले गोबर को सुखाकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है, फिर चंदन और लोबान जैसे सुगंधित पदार्थों के साथ मिलाकर धूपबत्ती और सजावटी सामग्री बनाई जाती है।पराग का मानना है कि यदि सही सोच और प्रयास हो, तो हर बेकार चीज में भी अवसर छिपा होता है। उनकी पहल न केवल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है, बल्कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी फैला रही है।
