नयी दिल्ली, 3 अक्टूबर (वार्ता) वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले 12 वर्ष में बढाई गयी ताकत से हाल के वैश्विक संकटों का सधे तरीके से सामना करने तथा आम लोगों के कल्याण और उद्योग-व्यवसाय की हिफाजत करने में सफल रही है और उच्च वृद्धि की राह पर बनी हुई है।
श्रीमती सीतारमण ने आने वाले समय में भी मजबूती बनाये रखने के लिए खास कर महत्वपूर्ण खनिजों सहित रणनीतिक संसाधनों तथा सुरक्षा की दृष्टि से जुड़े क्षेत्रों में रणनीतिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। वित्त मंत्री राजधानी में पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन के एक सत्र को संबोधित कर रही थीं। तीन दिन के सम्मेलन का विषय ‘तीव्र परिवर्तनों के युग में लचीलापन’ है और इसमें 30 देशों के नीति निर्माता और विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में उद्घाटन भाषण उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने दिया।
वित्त मंत्री ने कहा, ”अनिश्चितता अब वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थायी वास्तविकता है और नीतियों का निर्माण इसी को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। हमें आगे बढ़ते हुए लगातार लचीलापन विकसित करते रहना होगा। यह एक बार किया जाने वाला प्रयास नहीं है।”
वित्तमंत्री ने कहा , ” भारत के लिए लचीलेपन (दृढ शक्ति) का अर्थ पिछले एक दशक में निर्मित संरचनात्मक आधारों को और मजबूत करके आर्थिक विकास की गति को तेज करना और उसे व्यापक बनाना है।” उन्होंने कौटिल्य के सिद्धांत-“कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः”-का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका अर्थ है “सभी कार्यों की शुरुआत और सफलता सबसे पहले राजकोष पर निर्भर करती है।” उन्होंने कहा कि विकास संबंधी प्रतिबद्धताएं मजबूत और विश्वसनीय सार्वजनिक वित्तीय संसाधनों पर निर्भर करती हैं, जो उन्हें समर्थन देते हैं।
श्रीमती सीतारमण ने कहा, ”भारत के लिए लचीलापन (दृढ क्षमता) का अर्थ पिछले एक दशक में निर्मित संरचनात्मक आधारों को और मजबूत करके आर्थिक विकास की गति को तेज करना और उसे व्यापक बनाना है। आने वाले वर्षों की परीक्षा भी आंशिक रूप से अदृश्य होगी-वे ऐसे झटके होंगे, जिन्हें भारत परिवारों और उद्यमों की गतिविधियों में व्यवधान पैदा किए बिना सहन कर सकेगा।”
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत पिछले चार साल से युक्रेन-रूस युद्ध, आपूर्ति श्रृंखलाओं पर प्रभाव के कारण ईंधन और संसाधनों की कीमतों में तेजी, डॉलर में उछाल तथा ईरान की लड़ाई से होर्मूज जलडमरू मध्य मार्ग में व्यवधान जैसे संकटों के बीच उल्लेखनीय रूप से मजबूत होकर उभरा है, और — भारत की आर्थिक बुनियाद न केवल मजबूत बनी हुई है, अर्थव्यवस्था का आधार और मजबूत हो रहा है।” उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही आर्थिक वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत की दर से मजबूत आर्थिक वृद्धि तथा चालू खाते के 0.5 प्रतिशत के सीमित दायरे में था। अगस्त में खुदरा मुद्रास्फीति 4.82 प्रतिशत रही। वित्त मंत्री ने बैंकों की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के दशकों के न्यूनतम स्तर पर हैं तथा विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 766 अरब डॉलर के स्तर पर है।
वित्त मंत्री ने कहा कि अर्थव्यवस्था में आज जो लचीलापन दिखाई दे रहा है, वह 2014 से सोच-समझकर, चरण-दर-चरण निर्मित किया गया है। ” हमने उन क्षमताओं को मजबूत करने के लिए काम किया है, जिन पर सतत विकास निर्भर करता है जिनमें राज्य की स्थिति का सामना करने की क्षमता, अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता और नागरिकों तथा उद्यमों की विकास में भागीदारी की क्षमता शामिल है।” उन्होंने कहा कि इन 12 वर्षों में सरकारी व्यय की गुणवत्ता बढ़ने तथा राजकोषीय मजबूत, सरकारी पहलों के माध्यम से लोगों के जीवन में ठोस सुधार लाने में बदलकर किया गया है। आर्थिक अवसरों को उत्पादक गतिविधियों में बदला गया। मुद्रा ऋण योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक ऋण बिना किसी गारंटी के मंजूर किये गये हैं, जिससे स्वरोजगार और छोटे उद्यमों को समर्थन मिला है।पीएम स्वनिधि योजना से बड़ी संख्या में रेहड़ी-पटरी वालों को सहायता मिल रही है। अर्थव्यवस्था का औपचारिकीकरण गैर-कॉरपोरेट क्षेत्र में ऋण उठाव को भी बढ़ावा दे रहा है।
वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने वित्तीय प्रणाली को मजबूत करने के लिए बैंकिंग क्षेत्र में कई कठिन सुधार किए हैं1 बैंकों की शेयर पूंजी बढ़ाई गयी, वसूल नहीं हो रहे ऋणों का समाधान किया गया तथा बेहतर संचालन और जोखिम-प्रबंधन से बैंकों की क्षमता बढ़ी है। इससे अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है । उन्होंने बताया कि इस वर्ष अगस्त माह तक के एक वर्ष में गैर-खाद्य ऋण में 18.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे आर्थिक गतिविधियों के लिए वित्त का प्रवाह बना हुआ है। उन्होंने कहा कि आपातकालिक ऋण सहायता गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) ने कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने, कारोबार और रोजगार को बनाए रखने तथा व्यवधान के दौर में तरलता संबंधी दबावों का सामना करने में सहायता की। उन्होंने कहा कि 2024 से बुनियादी ढांचे के विस्तार पर विशेष बल दिया गया।इससे लोगों, कारखानों और बाजारों के बीच सम्पर्क का विस्तार हुआ है।
श्रीमती सीतारमण ने कहा, ‘वर्ष 2026-27 में ही हमने 12.22 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत व्यय का बजट रखा है-यह आंकिक आधार पर वित्त वर्ष 2004-14 तक के एक दशक में केंद्र सरकार द्वारा किए गए 12.39 लाख करोड़ रुपये के कुल खर्च के लगभग बराबर है। पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए दिए गए अनुदानों को शामिल करने पर (चालू वित्त वर्ष के लिए) प्रभावी पूंजीगत व्यय 17.15 लाख करोड़ रुपये , यानी जीडीपी का 4.4 प्रतिशत, हो जाता है।”
इसी क्रम में उन्होंने मोदी सरकार की ‘सुधारवादी सोच’ के साथ माल एवं सेवा कर, दिवाला एवं दिवालियापन संहिता , चार श्रम संहिताओं और जन विश्वास अधिनियमों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इससे से कारोबार करने में आसानी बढ़ी है, कर और कानूनी ढांचा अधिक भरोसे मंद हआ है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की मजबूती को बनाये रखने के लिए कार्यान्वयन पर निरंतर ध्यान और सार्वजनिक निवेश को समय पर पूरा करना आवश्यक है। उन्होंने इसी संदर्भ में मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के आस-पास रखने की नीति, नकदी फसलों के लिए मुल्य स्थिरीकरण योजना , न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि का भी जिक्र किया।
वित्त मंत्री ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष का अनुमान है कि भारत का सामान्य सरकारी ऋण 2026 में जीडीपी के 83.4 प्रतिशत से घटकर 2031 में 77.7 प्रतिशत हो जाएगा, जबकि वैश्विक स्तर पर ऋण का रुझान बढ़ रहा है। उन्होंने विश्व में बढ़ती अनिश्चिता की वास्तविकता को स्वीकार करने और उसके लिए तैयार रहने पर बल देते हुए रणनीतिक संसाधनों में आत्मनिर्भरता को पहली प्राथमिकता बताया । वित्त मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रणनीतिक इनपुट में संरचनात्मक आत्मनिर्भरता आवश्यक है। रणनीतिक संसाधनों की सुरक्षा व्यापक आर्थिक नीति के केंद्र में है।
उन्होंने कहा कि केवल लागत के आधार पर आपूर्ति के स्रोतों को अनुकूल मान लेना ठीक नहीं है। उन्होंने कमजोर और इकहरे स्रोत पर निर्भरता दूर कर देश के अंदर ही क्षमता बढ़ाने के सरकार कदमों का का उल्लेख किया1 इसी संदर्भ में उन्होंने नेशनल क्रिटिकल मिनिरल मिशन, रेयर अर्थ कारीडॉर , इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 तथा छोटी माड्यूलर परमाणु विद्युत इकाइयों के विकास जैसी पहलों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए वैश्विक आर्थिक संबंध खुले, पूर्वानुमान योग्य और नियम-आधारित बने रहने चाहिए। अधिक लचीली वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए देशों को अपनी साझेदारियों में विविधता लानी होगी। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण यह है कि वैश्विक वित्तीय ढांचा उन अर्थव्यवस्थाओं को भी उचित प्रतिनिधित्व दे, जहां अब वैश्विक वृद्धि का बड़ा हिस्सा केंद्रित है।
वित्त मंत्री ने बदली अर्थव्यवस्था की जरूरतों के हिसाब से कौशल विकास, निजी निवेश और नवाचार को प्रोत्साहन की आवश्यकता का भी जिक्र किया । वित्त मंत्री ने निवेश के पैमाने और निजी क्षेत्र की भागीदारी-दोनों को बढ़ाना हमारी नवाचार क्षमता को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। इसी संदर्भ में उन्होंने 1 लाख करोड़ रुपये के अनुसंधान, विकास एवं नवाचार कोष के गठन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह योजना इसी बदलाव को समर्थन देने के लिए तैयार की गई है।
