दिल्ली पर पीके की नजर

दिल्ली डायरी 

 

प्रवेश कुमार मिश्र 

 

चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर यानी पीके की राजनीतिक बिसात अब बिहार के बाद देश की धड़कन दिल्ली की तरफ घूमती दिख रही है. बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में मिली हालिया कामयाबी के बाद जन सुराज पार्टी ने देश की राजधानी दिल्ली की तरफ अपने कदम तेजी से बढ़ा दिए हैं . दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे गरम चर्चा पीके के उस मास्टरस्ट्रोक की है, जिसके तहत वह दिल्ली की सियासत में किंगमेकर की भूमिका निभाने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासियों यानी पूर्वांचली वोटरों को एक छत के नीचे एकजुट कर रहे है.जन सुराज दिल्ली में अपने राजनीतिक सफर का आगाज सीधे 2027 के एमसीडी चुनाव से करने जा रही है. क्योंकि दिल्ली की कुल आबादी में करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी पूर्वांचली मतदाताओं की है. पीके का गणित साफ है कि यदि वह दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले यूपी-बिहार के इस विशाल तबके को अपनी क्षेत्रीय पहचान और बिहार-यूपी के स्वाभिमान के नाम पर गोलबंद करने में कामयाब रहे, तो यह सीधे तौर पर भाजपा ,आम आदमी पार्टी तथा कांग्रेस की जमीन छीन जाएगा. पिछले दिनों दिल्ली में हुई जन सुराज समर्थकों की एक अहम बैठक में इस मिशन दिल्ली के लिए एक विशिष्ट संचालन समिति का ढांचा तैयार किया गया है.

चुनाव आयुक्त के खिलाफ मोर्चाबंदी की लगी होड़ 

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर से ही उठी आपत्तियों की खबरों ने विपक्ष को सरकार और आयोग पर चौतरफा हमला करने का बड़ा मौका दे दिया है. इस नए खुलासे के बाद से मुख्यधारा के विपक्षी दलों के बीच चुनाव आयोग को घेरने और खुद को सबसे बड़ा आंदोलनकारी साबित करने की एक तीखी होड़ मच गई है. इस सियासी घमासान के बीच कांग्रेस ने अपनी रणनीतिक बढ़त का दावा करते हुए मोर्चा संभाल लिया है. कांग्रेस का साफ कहना है कि वह पिछले कई सालों से एसआईआर के नाम पर डेटा सेंट्रलाइजेशन और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठाती रही है ऐसे में जो कुछ अभी खुलकर सामने आया है वह उसके सवालों की पुष्टि है. जबकि दूसरी तरफ, सपा, टीएमसी,राजद और शिवसेना उद्धव गुट के नेताओं ने भी यह दावा किया है कि चुनाव आयोग के खिलाफ वे भी जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं.

कांग्रेस व सपा के बीच दबाव की राजनीति

गठबंधन की राजनीति में दोस्ती जितनी बाहर दिखती है, सीटों के बंटवारे की टेबल पर दबाव उतना ही अंदरूनी होता है. उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले कांग्रेस और सपा के बीच सीटों की खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है. दोनों ही दल सार्वजनिक मंचों पर एकजुटता का दावा कर रहे हैं, लेकिन बंद कमरों में दबाव की राजनीति चरम पर है. सपा जहां खुद को उत्तरप्रदेश में बड़े भाई की भूमिका में देखते हुए कांग्रेस को सीमित सीटों पर समेटना चाहती है, वहीं लोकसभा चुनावों के बाद बढ़े हौसले के साथ कांग्रेस अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर अड़ी है. दोनों दलों के नेता रणनीतिक बयानों के जरिए एक-दूसरे की ताकत को नापने और दबाव बनाने में जुटे हैं. हालांकि कांग्रेसी रणनीतिकार पुरानी गलतियों को न दोहराते हुए जल्द से जल्द सम्मानजनक सीटें पक्की करना चाहते हैं, जबकि सपा अपने क्षेत्रीय आधार को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहती. दोनों दलों के नेता यह खुलकर कह रहे हैं कि मेरे बगैर तुम अधूरे हो.

भीतरघात के डर से आधी रात की गुपचुप बैठकें 

जैसे-जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, टिकटार्थियों से ज्यादा पार्टियां अपने ही विभीषणों से परेशान है. भाजपा व कांग्रेस मुख्यालय में इन दिनों दिन के उजाले से ज्यादा सरगर्मी आधी रात के बाद देखी जा रही है. दोनों दलों को चिंता है कि कुछ वरिष्ठ नेताओं के अनुशंसा नहीं सुनी गई तो ऐसे नेता अंदरूनी बगावत या मौन असहयोग की मुद्रा में आ सकते हैं. संभवतः इसी संभावित संकट को भांपकर केन्द्रीय रणनीतिकार असंतुष्टों को मनाने के लिए रात के अंधेरे में उनके आवासों पर दस्तक दे रहे हैं या उन्हें पार्टी मुख्यालय बुलाकर सभी सर्वे रिपोर्ट सामने रखकर बात कर रहे हैं.

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