दशलक्षण के बाद भी जारी रखें धर्म साधना : आचार्य श्री

भोपाल। आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने कहा कि दस दिनों तक की गई धर्म आराधना और साधना तभी सार्थक है, जब उसे दशलक्षण पर्व के बाद भी दैनिक जीवन में निरंतर जारी रखा जाए। श्रद्धा, विनय और आत्मभाव से की गई धर्म साधना केवलज्ञान रूपी ज्योति के प्रकट होने में सहायक बनती है।

दस दिवसीय श्रावक संस्कार एवं अध्यात्म शिविर के समापन सत्र को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दसों धर्मों को उनके गुणों के आधार पर अलग-अलग समझाया जा सकता है, लेकिन वे मूल रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। क्षमा धर्म की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि अत्यंत सावधानीपूर्वक साधना करने वाले साधुओं से भी प्रमादवश भूल हो सकती है। इसी कारण प्रतिक्रमण की परम्परा आत्मावलोकन और आत्मशुद्धि का अवसर प्रदान करती है।

भगवान पार्श्वनाथ के जीवन में आए उपसर्गों का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि कष्ट देने वाले व्यक्ति के प्रति भी मन में वैरभाव नहीं रखना चाहिए। वास्तविक शत्रु कोई दूसरा व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने ही कर्म हैं।

उन्होंने कहा कि दशलक्षण धर्म की पूर्णता को साधना का अंत नहीं मानना चाहिए। जैन आगम का एक पृष्ठ भी समझकर पढ़ना धर्म प्रभावना का माध्यम बन सकता है।

शिविर के समापन पर प्रतिभागियों ने उपवास, एकासन, त्याग और संयम के अनुभव साझा किए। इस अवसर पर प्रतिभागियों का सम्मान भी किया गया।

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