
बागली। जानकारी के अनुसार बागली नगर की स्थापना के बाद से ही कृष्ण और राधा को समर्पित मंदिरों का निर्माण नागर शैली में हुआ तभी से डोल ग्यारस पर मंदिर समितियों (पुजारी)की ओर से मंदिर में विराजित भगवानो डोल के रुप मे सजा कर नगर भ्रमण करवानेने की परंपरा है। उस वक्त तीन प्राचीन मंदिर जिनमें शामिल मुकुंद जी मंदिर राधा कृष्ण मंदिर एवं मुकुंद बाग मंदिर शामिल रहे इस दौरान चंपा बाग मंदिर से भाले के रूप में निशान आगे आगे निकाला जाता रहा कालांतर में जगदीश मंदिर राधा कृष्ण(गीता भवन) मंदिर एवं गुप्ता समाज के राधा कृष्ण मंदिर से भी डोल निकालने की परंपरा आरंभ होने के साथ वर्तमान में निशान सहित सात मंदिरों के डोल निकालने की परंपरा चल रही है।
मंदिरों के आगे चलने वाले निशान को काली सिंध नदी पर ले जाया जाता है ।जहां निशान पूजा होती है, फिर वहां से राज परिवार निवास पर जाता है ,जहां राज परिवार के सदस्य निशान की पूजा करते हैं। इस प्रकार भ्रमण करने वाले भगवान के डोलो की भी पूजा भी गड़ी चौक मैदान में राज परिवार सहित अन्य श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है। चंपा बाग मंदिर के पुजारी राजेंद्र पाठक ने बताया कि चंपा बाग मंदिर बनने के पूर्व इस स्थान पर साधु संतों की अखाड़ा परिषद व्यवस्था लागू थी। तभी से नगर के प्रमुख मार्ग से निकालने वाली डोल व्यवस्था के आगे भाले के रूप में निशान निकाला जाता है। इसी प्रकार गुप्ता मंदिर(राधा कृष्ण) जगदीश मंदिर से डोल निकालने की परंपराएं भी 1970 के बाद से ही शुरू की गई। वर्तमान में एक निशान सहित 6 पृथक पृथक मंदिरों से डोल निकालने की परंपरा निर्वहन हो रही है।
आसपास के क्षेत्र में भी जिसमें जटाशंकर तीर्थ बेहरी नयापुरा छतरपुरा आदि स्थान पर भी डोल निकलने के समाचार मिले हैं। जटाशंकर सेवा समिति से जुड़े धार्मिक श्रद्धालु प्रताप सिंह डाबी ने इस विषय पर बताया इस परंपरा से सामाजिक जागरूकता आई है। अलग-अलग मंदिरों से निकलने वाले डोल के साथ मंदिर से जुड़े स्थानीय श्रद्धालु विशेष रूप से शामिल रहते हैं ।नागर चित्तौड़ा समाज मंदिर से निकलने वाले डोल के साथ गुप्ता समाज के अनुयाई दिखाई देते हैं मुकुंद जी मंदिर से निकलने वाले डोल के साथ-साथ राजपूत समाज के श्रद्धालु बड़ी संख्या में रहते हैं। राधा कृष्ण मंदिर से निकलने वाले डोल के साथ ब्राह्मण समाज के श्रद्धालु दिखाई देते हैं उसी प्रकार जगदीश मंदिर से निकलने वाले डोल के साथ मंदिर परिवार से जुड़े पुजारी परिवार के परिजन और नजदीक के श्रद्धालु रहते हैं वही माहेश्वरी समाज द्वारा निकाले गए डोल में इसी समाज के लोग श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं। इस परंपरा से सामाजिक समरसता बढ़ती है।
