नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु के बहुचर्चित SASTRA यूनिवर्सिटी जमीन विवाद पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को एक बेहद संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ यूनिवर्सिटी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बेदखली के नोटिस को चुनौती दी गई थी। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उस जमीन पर कोई कमर्शियल मॉल, रिसॉर्ट या कोई गैर-कानूनी गतिविधि चल रही होती, तो प्रशासन अब तक कब्जा करने वालों को बाहर निकाल चुका होता, लेकिन चूंकि यह जमीन एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान द्वारा जनहित में शिक्षा के लिए इस्तेमाल की जा रही है, इसलिए इस पर संतुलित फैसला लिया जाना चाहिए।
ओपन जेल प्रोजेक्ट के लिए दूसरी जमीन के प्रस्ताव पर विचार करने को कहा, सरकार की अड़ियल रुख पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के रुख को ‘अड़ियल’ करार दिया और कहा कि राज्य सरकार को 1985 से पेंडिंग पड़े ओपन-एयर जेल प्रोजेक्ट के लिए यूनिवर्सिटी द्वारा ऑफर की गई अन्य जमीनों या उसके बदले तय मार्केट वैल्यू को स्वीकार करने पर विचार करना चाहिए। बेंच ने स्पष्ट किया कि इस पूरे समाधान से यह बात सुनिश्चित होनी चाहिए कि राज्य सरकार को एक इंच जमीन या एक पैसे का भी नुकसान न हो। साथ ही अदालत ने तंज कसते हुए यह भी सवाल उठाया कि क्या तमिलनाडु में शैक्षणिक संस्थान सरप्लस मात्रा में उपलब्ध हैं, जिससे युवा पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित करने जैसे कदम उठाए जाएं।
यूनिवर्सिटी की ओर से वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने दी दलील, अदालत ने मामले में कड़ा और स्पष्ट संदेश देने की बात कही
यूनिवर्सिटी की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल द्वारा सरकार को तीन अन्य वैकल्पिक जमीनें ऑफर की गई थीं, लेकिन राज्य प्रशासन की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। दूसरी ओर, तमिलनाडु सरकार के वकील राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि दूसरी जगह दी जा रही जमीनें उपयुक्त नहीं हैं और इस तरह के समझौतों से अतिक्रमण को बढ़ावा मिल सकता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से ऐसा रास्ता निकालने को कहा है जिससे एक तरफ जहां सरकारी हितों की पूरी रक्षा हो, वहीं दूसरी ओर हजारों छात्रों के भविष्य और संस्थान की शैक्षणिक सेवाएं भी सुरक्षित रह सकें।

