International Day of Peace: कांगो से लेबनान तक, जब UN के इन 5 शांति अभियानों ने युद्ध के बीच बहाल की शांति

कांगो, अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस पर जानें UN के पांच प्रमुख शांति मिशनों की कहानी, जिन्होंने कांगो, स्वेज, कंबोडिया, सिएरा लियोन और लेबनान में शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।

हर साल 21 सितंबर को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस (International Day of Peace) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य दुनियाभर में शांति, अहिंसा और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देना है। साथ ही, लोगों को युद्ध, हिंसा और संघर्ष के बजाय बातचीत और सहयोग के जरिए विवाद सुलझाने के लिए प्रेरित करना है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 30 नवंबर 1981 को प्रस्ताव 36/67 के जरिए अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य दुनिया के सभी देशों और लोगों के बीच शांति के आदर्शों को मजबूत करना और वैश्विक स्तर पर सहयोग, सहिष्णुता व अहिंसा को प्रोत्साहित करना था। आइए इस मौके पर हम आपको संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के 5 बड़े सैन्य अभियानों के बारे में बताते हैं, जिसका मकसद युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि शांति स्थापित करना था।

पहली बार 1982 को मनाया गया अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस
पहली बार यह दिवस सितंबर 1982 में मनाया गया। शुरुआत में इसके लिए सितंबर महीने का तीसरा मंगलवार निर्धारित था। हालांकि, 7 सितंबर 2001 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 55/282 पारित कर 21 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस की स्थायी तारीख घोषित कर दिया। साल 2002 से यह दिवस हर साल इसी तारीख को मनाया जाने लगा। इस दिन को निर्धारित करने के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य दुनिया भर में युद्ध और हिंसा को रोकने की अपील करना भी है।

कांगो गृहयुद्ध रोकने के लिए उतरे 20 हजार शांति सैनिक
कांगो की आजादी के कुछ ही दिनों बाद देश राजनीतिक संकट और हिंसा में घिर गया। बेल्जियम की सैन्य दखलंदाजी और कटांगा प्रांत के अलगाववादी प्रयासों ने हालात और जटिल कर दिए। ऐसे में कांगो सरकार की मदद के लिए संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई 1960 में ONUC मिशन शुरू किया।

शुरुआत में इसका उद्देश्य बेल्जियम की सेना की वापसी और कानून-व्यवस्था बहाल करने में सहायता करना था। बाद में मिशन को देश की क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने और गृहयुद्ध रोकने के लिए व्यापक अधिकार दिए गए। अपने चरम पर इसमें लगभग 20 हजार सैन्यकर्मी तैनात थे।

स्वेज संकट में UN सेना की भूमिका
1956 में स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के बाद मिस्र और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ गया। अक्टूबर में इजरायल ने मिस्र पर हमला किया, जिसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस की सेनाएं भी मिस्र में दाखिल हो गईं। इस संकट को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नवंबर 1956 में पहला सशस्त्र शांति मिशन UNEFI की स्थापना की गई।

इसका काम युद्धविराम की निगरानी करना, विदेशी सेनाओं की वापसी सुनिश्चित करना और मिस्र-इजरायल सीमा पर बफर व्यवस्था बनाना था। संयुक्त राष्ट्र की तैनाती के बाद ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाएं दिसंबर 1956 तक, जबकि इजरायली सेना मार्च 1957 तक मिस्र से हट गई।

कंबोडिया गृहयुद्ध के बाद लोकतंत्र की राह पर बढ़ा देश
दशकों के संघर्ष और गृहयुद्ध से जूझ रहे कंबोडिया में शांति स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 1992 में UNTAC मिशन शुरू किया। इसका आधार 1991 में हुआ पेरिस शांति समझौता था। मिशन को केवल युद्धविराम की निगरानी ही नहीं, बल्कि प्रशासन, मानवाधिकार, शरणार्थियों की वापसी और स्वतंत्र चुनाव कराने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई।

संयुक्त राष्ट्र ने चुनावी प्रक्रिया की निगरानी की और मतदान के लिए व्यापक लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई। मई 1993 में हुए चुनाव में करीब 89.56 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं ने हिस्सा लिया। इसके बाद निर्वाचित संविधान सभा ने नया संविधान तैयार किया और सितंबर 1993 में कंबोडिया संवैधानिक राजतंत्र बना।

सिएरा लियोन में गृहयुद्ध खत्म करने में की मदद
सिएरा लियोन में हीरों के अवैध कारोबार, विद्रोह और लंबे गृहयुद्ध ने देश को तबाह कर दिया था। शांति समझौते को लागू कराने और लड़ाकों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अक्टूबर 1999 में UNAMSIL मिशन बनाया। इसके सैनिकों ने युद्धविराम की निगरानी की, नागरिकों की सुरक्षा में मदद की और पूर्व लड़ाकों के निरस्त्रीकरण, पुनर्वास व समाज में पुनर्वास की प्रक्रिया में सहयोग दिया।

मई 2000 में विद्रोहियों द्वारा सैकड़ों शांति सैनिकों को बंधक बनाए जाने से मिशन गंभीर संकट में आ गया, लेकिन बाद में इसका विस्तार किया गया। 2002 तक 75 हजार से अधिक पूर्व लड़ाकों ने हथियार छोड़े। मिशन ने चुनाव कराने और पुलिस व्यवस्था मजबूत करने में भी मदद की। दिसंबर 2005 में इसका कार्यकाल पूरा हुआ।

लेबनान में दशकों से सीमा पर शांति की निगरानी
मार्च 1978 में इजरायली सेना के लेबनान में प्रवेश के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने UNIFIL मिशन स्थापित किया। इसका उद्देश्य इजरायली सेना की वापसी की पुष्टि करना, दक्षिणी लेबनान में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बहाल करने में मदद देना और लेबनानी सरकार का नियंत्रण मजबूत करना था।

2006 के इजरायल-हिजबुल्लाह संघर्ष के बाद मिशन का दायरा बढ़ाया गया। इसमें युद्धविराम की निगरानी, लेबनानी सेना की तैनाती में सहयोग और आम नागरिकों तक मानवीय सहायता पहुंचाने में मदद शामिल हुई। UNIFIL ने दशकों तक सीमा क्षेत्र में गश्त और निगरानी की, हालांकि क्षेत्र में तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2026 के अंत तक मिशन समाप्त करने का निर्णय लिया है।

 

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