
सागर। सागर नगर के वर्धमान कॉलोनी में विराजमान मुनि श्री पदम सागर महाराज एवं छुल्लक तात्पर्य सागर महाराज ने दसलक्षण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म के बारे में बताते हुए कहा कि शौच धर्म हमें सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला उसी में खुश रहो। हमारे चित्त को गंदा करने वाला विकार एवं दुर्बलताओं का कारण लोभ है लोभ मनुष्य के विचार शक्ति और संतोष को खा जाता है, हमारा लोभ कभी कम नहीं होता, तृष्णा बढ़ती रहती है।
हम भौतिक संसाधनों एवं धन दौलत में खुशी खोजते रहते हैं, यह महज एक भ्रम है, शौच धर्म का अर्थ मन वचन और काय शरीर की पवित्रता और लोभ का अभाव है, अंतरंग की पवित्रता- बाहरी शुद्धि के साथ विचारों और अंतरात्मा को पवित्र रखना है असली शौच धर्म है मुनिराज शौच धर्म का पूर्णता पालन करते हैं! वह अपने पास परिग्रह नहीं रखते हैं, मुनिराज जब बैठे हुए थे उन्होंने देखा एक मक्खी उड़ नहीं पा रही है उसके पंख गीले थे अपने पंखों पर भार महसूस कर रही थी जब पंख सूख गए तो उड़ने लगी। यही दशा संसारी प्राणी की है संसारी प्राणी अपने ऊपर ना जाने कितना भार लादे हुए हे वह स्वर्ग को पाना चाहता है परंतु लोभ रूपी भार को कम नहीं कर पा रहा है। पुष्पदंत भगवान का मोक्ष कल्याणक महा महोत्सव धूमधाम से मनाया गया ।कार्यक्रम में पंडित संदीप शास्त्री, नाथूराम जूनावाले, कमल बिलहरा, पवन जैन सहित साधर्मी बंधुओ ने सहभागिता की।
