अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमत, रुपये की कमजोरी और महंगाई को लेकर है। 16 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा, जबकि हॉरमुज़ स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर से काफी नीचे बनी हुई है।
महंगा तेल भारत के लिए क्यों चिंता?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है। इसका असर देश के व्यापार घाटे और डॉलर की मांग पर भी पड़ सकता है।
महंगे तेल के बीच रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। 16 सितंबर को रुपया करीब 95.93 रुपये प्रति डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने रुपये में तेज गिरावट को सीमित करने के लिए बाजार में डॉलर की बिक्री भी की है।
*क्या बढ़ सकती है महंगाई?*
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और उद्योगों की लागत बढ़ सकती है। इससे अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि तेल महंगा होते ही आपकी EMI अगले दिन बढ़ जाएगी। EMI पर असर तब पड़ सकता है जब महंगाई और ब्याज दरों को लेकर RBI की नीति प्रभावित होती है। यानी तेल से EMI तक असर अप्रत्यक्ष रास्ते से पहुंचता है।
*शेयर बाजार पर भी नजर*
महंगा तेल और कमजोर रुपया शेयर बाजार के लिए भी चिंता का विषय बन सकते हैं। 15 सितंबर को बढ़ते तेल और महंगाई की चिंता के बीच निफ्टी करीब 1 फीसदी गिरा था। 16 सितंबर को भी बाजार की चाल पर महंगा क्रूड और अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता का असर देखा गया।
इसलिए अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने पर भारत के लिए सबसे अहम सवाल होगा—तेल कितना महंगा होता है और हॉरमुज़ से सप्लाई कितने समय तक प्रभावित रहती है। यही तय करेगा कि इसका असर सिर्फ बाजार तक सीमित रहता है या धीरे-धीरे आम आदमी की जेब तक भी पहुंचता है।
