नई दिल्ली। कैंपा ने ₹10 की बोतल से बाजार में हलचल मचा दी… लेकिन सवाल ये है कि Coca-Cola और Pepsi भी अपनी कीमतें क्यों नहीं घटा रहीं? क्या ये सच में Price War है… या इसके पीछे पूरा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है?
दरअसल, Campa Cola की कम कीमत ने भारत के सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में सीधी चुनौती खड़ी की है। लेकिन यहां सिर्फ बोतल की कीमत देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
कैंपा की रणनीति में कम कीमत के साथ-साथ पैक साइज, डिस्ट्रीब्यूशन और ज्यादा से ज्यादा दुकानों तक पहुंच अहम हैं। ₹10 की बोतल ग्राहक को ट्रायल के लिए आकर्षित कर सकती है और छोटे शहरों-कस्बों के प्राइस-सेंसिटिव बाजार में पकड़ बनाने में मदद कर सकती है।
लेकिन Coca-Cola और Pepsi के लिए कीमत घटाना इतना आसान नहीं है। बड़ी कंपनियों के पास पहले से मजबूत ब्रांड, विशाल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और अलग-अलग कीमतों और पैक साइज वाला पूरा पोर्टफोलियो है। हर जगह कीमत घटाने का मतलब सिर्फ ग्राहक को सस्ता पेय देना नहीं… बल्कि मार्जिन पर भी असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि Coca-Cola के CEO Henrique Braun ने हालिया बयान में कहा कि कंपनी प्रतिस्पर्धियों की “irrational pricing” का पीछा नहीं करेगी। यानी कंपनी सिर्फ मुकाबले के लिए कीमतों की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय अपनी प्राइसिंग डिसिप्लिन बनाए रखना चाहती है।
*क्या कैंपा की एंट्री से खेल बदल गया है?*
बिल्कुल—चुनौती अब सिर्फ स्वाद की नहीं, कीमत, पहुंच और वैल्यू की भी है। और असली लड़ाई शायद ₹10 की बोतल की नहीं… उस ग्राहक को लंबे समय तक अपने साथ बनाए रखने की है।
