ग्वालियर। ग्वालियर, शिवपुरी और सागर में शराब पीने के बाद हुई मौतों ने मध्य प्रदेश में अवैध शराब के नेटवर्क पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नवभारत की पड़ताल में शिवपुरी, श्योपुर और मुरैना के ग्रामीण इलाकों से ऐसी तस्वीर सामने आई है, जहां स्वीकृत शराब ठेका नहीं… लेकिन शराब आसानी से उपलब्ध होने की शिकायतें हैं।
सवाल सीधा है—
जब ठेका नहीं, तो शराब पहुंच कौन रहा है? बेच कौन रहा है? और निगरानी किसकी जिम्मेदारी है?
ग्रामीणों के मुताबिक कुछ गांवों में कच्ची शराब के साथ बाजार में बिकने वाले ब्रांड की शराब भी उपलब्ध कराई जा रही है।
शिवपुरी के ग्राम कोटा में रहने वाली रश्मी आदिवासी ने आरोप लगाया कि इलाके में कच्ची शराब के साथ गांजा भी बेचा जा रहा है। उनका दावा है कि कुछ जगह नशे का सामान उधार दिया जाता है और मजदूरी मिलने के बाद पैसे वसूले जाते हैं।
अगर इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होती है, तो मामला सिर्फ अवैध शराब की बिक्री का नहीं… बल्कि गरीब और आदिवासी परिवारों पर पड़ रहे आर्थिक असर का भी है।
शिवपुरी के कई ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने खुद शराब के खिलाफ मोर्चा संभाला।
अमोला थाना क्षेत्र के थरखेड़ा, अमोलपठा और मनपुरा में विरोध प्रदर्शन की घटनाएं सामने आईं। कुछ जगह महिलाओं के शराब की पेटियां और बोतलें सड़क पर फेंकने की बात भी सामने आई।
यानी सवाल ये भी है—
क्या अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई के लिए अब ग्रामीणों को खुद सड़क पर उतरना पड़ रहा है?
ग्वालियर-चंबल में अवैध शराब का मामला नया नहीं है।
2021 में मुरैना के सुआवारा, छैरा और मानपुर गांव में जहरीली शराब से 24 लोगों की मौत हुई थी।
2001 में भी मुरैना में जहरीली शराब ने 24 जानें ली थीं।
अब एक बार फिर सवाल उसी सप्लाई सिस्टम पर है—
शराब बनती कहां है, पहुंचती कैसे है और गांवों तक कौन पहुंचा रहा है?
आबकारी विभाग का कहना है कि अवैध शराब के निर्माण और बिक्री के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है और शराब दुकानों का संचालन वैधानिक प्रक्रिया के तहत हो रहा है।
लेकिन सवाल बरकरार है—
जिन गांवों में ठेका नहीं, वहां शराब पहुंच कैसे रही है?
कितनी कार्रवाई हुई? कितनी शराब जब्त हुई? कितने मामले दर्ज हुए?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि सरकारी दावे और जमीन पर मौजूद हकीकत के बीच कितना फर्क है।
