
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जारी एक आदेश को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जल्दबाजी में एनएसए का फैसला लिया गया । दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया।
कलेक्टर ने महज एक ही दिन के भीतर पूरी फाइल प्रोसेस करके 6 जनवरी 2026 को याचिकाकर्ता पर रासुका तामील कर दी थी। कोर्ट ने कहा कि इतनी जल्दबाजी साफ दर्शाती है कि मामले में जिला प्रशासन ने अपने स्वतंत्र विवेक का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया।
अदालत ने कानून की याद दिलाते हुए कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन एक बेहद असाधारण कदम है। इसे लागू करते समय हमारे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत दिए गए सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन होना अनिवार्य है।
हाई कोर्ट ने देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य मामले में तय किए गए सिद्धांतों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक समाज या सार्वजनिक व्यवस्था को कोई बड़ा और व्यापक खतरा न हो, तब तक इस कड़े कानून को रूटीन या सामान्य प्रक्रिया की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अदालत ने साफ किया कि छोटे-मोटे अपराध या स्थानीय कानून-व्यवस्था को आधार बनाकर किसी को सीधे रासुका में बंद नहीं किया जा सकता। पब्लिक ऑर्डर प्रभावित होने का मतलब है जिससे पूरे समाज में गहरा डर, असुरक्षा या सार्वजनिक स्वास्थ्य को कोई बहुत बड़ा खतरा पैदा हो रहा हो।
हाई कोर्ट ने जबलपुर जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किए गए आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है और याचिकाकर्ता की दोनों रिट याचिकाएं मंजूर कर ली हैं।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि पुलिस रिकॉर्ड में बताए गए कई मामले पुराने थे। कई मामलों में आरोपी पहले ही बरी हो चुके थे। कोर्ट के अनुसार सीएसपी गोहलपुर ने छह जनवरी को बीस मामलों और दो प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की रिपोर्ट दी। यह रिपोर्ट उसी दिन अतिरिक्त एसपी ने एसपी को भेजी। एसपी ने भी उसी दिन कलेक्टर को भेज दिया। इसके बाद कलेक्टर ने 6 जनवरी को ही एनएसए का निरोध आदेश जारी कर दिया। यह पूरा मामला राजेन्द्र ठाकुर उर्फ छोटू और राजेश ठाकुर उर्फ भैया से जुड़ा है। जिनके खिलाफ रासुका की कार्रवाई हुई थी।
