
नई दिल्ली,वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, यूक्रेन संकट, पश्चिम एशिया के युद्ध और संरक्षणवाद के कठिन दौर के बीच भारत मंडपम एक अभूतपूर्व कूटनीतिक इतिहास का गवाह बना है. भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में तमाम गहरे रणनीतिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए सभी 11 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणा पत्र 2026 को पारित कर दिया है. इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर भारत की एक बहुत बड़ी और निर्णायक जीत माना जा रहा है.
भारत ने एक कुशल मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे परस्पर रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के हितों को संतुलित किया और बिना किसी आपत्ति के इस साझा प्रस्ताव पर आम सहमति बनाई.
सम्मेलन के पूर्ण सत्र का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक व्यवस्था के मौजूदा ढांचे पर सीधा प्रहार किया और दुनिया को पुराने विशेषाधिकारों की जकड़न से बाहर निकलने का आह्वान किया. बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन और सस्टेनेबिलिटी की थीम पर बोलते हुए मोदी ने रेखांकित किया कि जलवायु परिवर्तन, महामारी और खाद्य-ऊर्जा असुरक्षा जैसे संकटों का खामियाजा ग्लोबल साउथ अग्रिम पंक्ति में भुगतता है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उसे सबसे पीछे धकेल दिया जाता है. प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि मौजूदा विशेषाधिकार के पिरामिड को अब साझेदारी के मंच में तब्दील करना होगा, जहां विकासशील देश केवल वैश्विक नियमों का पालन करने वाले न रहकर खुद अंतरराष्ट्रीय नियम तय करने वाली शक्ति बनें. इस सोच को अमलीजामा पहनाने के लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण सहित एक महत्वाकांक्षी दस सूत्रीय सुधार रोडमैप पेश किया.
इस महामंथन के बीच सबसे बड़ी कूटनीतिक हलचल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उच्चस्तरीय द्विपक्षीय वार्ता से पैदा हुई. इस ऐतिहासिक वार्ता में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त बहाली और सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव घटाने की दिशा में हुई हालिया सैन्य-राजनयिक प्रगति की सराहना की गई. दोनों नेताओं ने सीमा पर स्थायी शांति बनाए रखने के लिए सैन्य कमांडरों के बीच संवाद की निरंतरता को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की रणनीतिक गलतफहमी से पूरी तरह बचा जा सके. तनावमुक्ति के इस माहौल का सीधा असर दोनों देशों के आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के पुनर्संतुलन पर भी दिखाई दिया, जहां पिछले कुछ समय से निलंबित पड़ी सीधी वाणिज्यिक उड़ानों को फिर से शुरू करने पर सहमति बन गई.
वर्ष 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन के हाथों में सौंपने का निर्णय भी हुआ है.ऐसे में नई दिल्ली में बनी यह सहमति यह सुनिश्चित करेगी कि बीजिंग आगामी वर्षों में इस संगठन को किसी पश्चिम-विरोधी आक्रामक गुट में बदलने के बजाय, भारत द्वारा स्थापित किए गए समावेशी और न्यायसंगत आर्थिक मंच के एजेंडे को ही आगे बढ़ाए.
इस द्विपक्षीय संवाद ने साबित कर दिया है कि सीमाई मतभेदों के बावजूद एशिया की ये दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और बहुध्रुवीय व्यवस्था के निर्माण में एक-दूसरे की अपरिहार्य साझेदार हैं.
शीर्ष नेताओं के बयानों और उनके कूटनीतिक रुख ने भी इस बैठक को विशेष चर्चा में ला दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच से यह स्पष्ट संदेश दिया कि आज का युग युद्ध का नहीं है और किसी भी संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान से नहीं, बल्कि केवल आपसी संवाद से ही संभव है. उन्होंने आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की अपनी पुरानी नीति को दोहराते हुए कहा कि आतंकवाद को प्रायोजित और पोषित करने वाली ताकतों की बिना किसी दोहरे मापदंड के अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही तय होनी चाहिए.
वहीं लंबे समय के बाद भारत की धरती पर कदम रखने वाले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ की एकजुटता पर जोर दिया और उभरते देशों के सामूहिक विकास को आवश्यक बताया.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भी बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का पुरजोर समर्थन किया और पश्चिमी देशों के एकतरफा प्रतिबंधों को वैश्विक व्यापार में सबसे बड़ी बाधा करार दिया.
जानकार मान रहे हैं कि ब्रिक्स ने यह साबित कर दिया है कि आंतरिक मतभेदों के बावजूद यह समूह एक साझा आर्थिक और राजनीतिक एजेंडे पर एकजुट हो सकता है. भारत ने इस सम्मेलन के माध्यम से खुद को एक संतुलित और जिम्मेदार सुधारक शक्ति के रूप में वैश्विक मंच पर स्थापित किया है, जिसने समूह को किसी पश्चिमी विरोधी गुट में बदलने के बजाय एक न्यायसंगत आर्थिक मंच बनाने पर ध्यान केंद्रित रखा. नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से दुनिया को यह साफ संदेश गया है कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था अब कुछ चुनिंदा विकसित देशों के इशारों पर नहीं चलेगी, बल्कि ग्लोबल साउथ की उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक नियमों को तय करने में बराबर की हिस्सेदार और मार्गदर्शक बन चुकी हैं.
सहमति और समझौतों के धरातल पर देखें तो इस बार ब्रिक्स देशों ने आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर कई दूरगामी कदम उठाए हैं. सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार को और अधिक सरल बनाने तथा अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से स्थानीय मुद्राओं में ऋण सुविधाएं बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं. इसके साथ ही वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए कॉन्टिनजेंट रिजर्व अरेंजमेंट की रूपरेखा को और मजबूत किया गया. व्यापारिक सुरक्षा के लिए ग्लोबल वैल्यू चेन्स एक्शन प्लान 2026-2030 को मंजूरी दी गई, जिससे छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए व्यापारिक लेन-देन की लागत को कम किया जा सके और उनकी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित बनाया जा सके. इसके अतिरिक्त, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसे स्थापित वैश्विक संस्थानों में आमूल-चूल सुधार करने पर भी सभी देशों ने सहमति जताई, ताकि समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं के अनुसार विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाई जा सके.
