लाल से नीले गमछे की ओर बढ़े सपाई

दिल्ली डायरी 

प्रवेश कुमार मिश्र 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में रंगों का यह नया बदलाव सिर्फ पहनावे का नहीं है बल्कि यह सत्ता प्राप्ति के लिए एक नई, गहरी व सोची-समझी रणनीतिक बिसात का प्रतीक है. सपाइयों का लाल से नीले गमछे की तरफ बढ़ना महज एक सतही कदम नहीं है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव को साधने की एक बड़ी सोशल इंजीनियरिंग है. नीला रंग जोड़कर अखिलेश यादव सीधे तौर पर आंबेडकरवादी और दलित मतदाताओं को अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित व अल्पसंख्यक के दायरे में मजबूती से बांधना चाहते हैं. दरअसल इस बदलाव को कुछ लोग लोहियावादी और अंबेडकरवादी के वैचारिक मिलन की एक नई कोशिश के रूप में देख रहे हैं. जिसके जरिए सपाई रणनीतिकार बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में सीधे सेंधमारी करना चाहते हैं. सपा छात्र सभा के नए ड्रेस कोड यानी नीली टी-शर्ट और जींस के बहाने युवाओं और जेन जी को एक आधुनिक और समावेशी पहचान देने का प्रयास किया जा रहा है, जिस पर साइकिल के साथ बाबा साहब की तस्वीर भी लगाई गई है. हालांकि सपाईयों की बदलते गमछे पर प्रतिक्रिया भी आरंभ हो गई है. भाजपा ने इसे दलितों को लुभाने का ढोंग कहा है जबकि बसपा के लोगों ने इसे राजनीतिक बहुरूपियापन करार दिया है. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि सिर पर सजी पारंपरिक लाल टोपी के साथ गले का यह नया नीला गमछा जमीन पर कितना सियासी असर दिखाता है.

विपक्षी चेहरा विजय या राहुल …..

2029 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष के प्रधानमंत्री चेहरे को लेकर दक्षिण भारत से शुरू हुई बहस ने अब दिल्ली के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है. यह बहस कांग्रेस नेता राहुल गांधी और तमिलनाडु के नवनियुक्त मुख्यमंत्री व तमिलागा वेत्री कझगम प्रमुख सी जोसेफ विजय के इर्द-गिर्द घूम रही है. हालिया चुनावी सफलता के बाद जिस तरह टीवीके के नेताओं ने विजय को सीधे प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया, उसने कांग्रेस के भीतर भारी खलबली और नाराजगी पैदा कर दी है. हालांकि इस मुहिम पर पानी डालते हुए कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बेहद आक्रामक और तल्ख रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि विपक्षी गठबंधन यानी इंडिया समूह का चेहरा केवल और केवल राहुल गांधी ही होंगे. कांग्रेस ने दो टूक चेतावनी दे डाली है कि अगर राहुल के चेहरे पर सर्वसम्मति नहीं बनी, तो वे तमिलनाडु सरकार से अपने मंत्री पद छोड़ने और गठबंधन से बाहर आने में देर नहीं करेंगे. इसके बाद इस घमासान पर भाजपा ने चुटकी लेते हुए तीखा तंज कसा है. भाजपा नेताओं ने इसे विपक्ष का मुंगेरीलाल के हसीन सपने करार देते हुए कहा कि वहां अभी से एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति हो चुकी है.

पंजाब कांग्रेस में जारी कलह को शांत करेंगे पायलट 

चुनाव की दहलीज पर खड़ी पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी अब पार्टी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी थी. राजा वड़िंग और चन्नी खेमे के बीच सार्वजनिक रूप से होते आ रहे अहंकारों के टकराव ने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया था. ऐसे नाजुक वक्त में पार्टी हाईकमान ने सचिन पायलट को प्रभारी बनाकर बड़ा दांव खेला है. पायलट के सामने चुनौती सिर्फ दोनों बड़े नेताओं से हाथ मिलवाना नहीं, बल्कि गुटबाजी खत्म कर भीतरघातियों को बाहर का रास्ता दिखाना भी है. पंजाब कांग्रेस के इस फेरबदल पर भाजपा व आप ने चुटकी लेते हुए तीखा तंज कसा है. भाजपा नेताओं का कहना है कि छत्तीसगढ़ में मात खा चुके प्रभारी को हटाकर राजस्थान के असंतुष्ट नेता को पंजाब सौंपना यह साबित करता है कि कांग्रेस के पास चेहरों का अकाल है. वहीं सत्ताधारी आप ने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस चाहे दिल्ली से कितने भी पायलट बुला ले, पंजाब में उसकी अंदरूनी लड़ाई का विमान क्रैश होना तय है.

सेवा संकल्प के सहारे नब्ज टटोलने की कोशिश

17 सितंबर से भाजपा द्वारा शुरू होने वाले महीने भर के सेवा संकल्प अभियान सिर्फ जनसेवा नहीं है बल्कि कहा जा रहा है कि इसके जरिए पार्टी जनता की नब्ज टटोलने की एक बड़ी संगठनात्मक और राजनीतिक कोशिश करेगी. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मोदी के जन्मदिन और उनके मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री पद तक 25 वर्षों के सफर के उपलक्ष्य में आयोजित हो रहे इस अभियान का असली मकसद आगामी चुनावों से पहले जमीनी स्तर पर सत्ताविरोधी लहर और वोटरों के मूड को भांपना है. चर्चा है कि 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चलने वाले इस महा-अभियान के दौरान जब लाखों कार्यकर्ता आशीर्वाद का दिया जलाने और विकसित भारत यात्रा के बहाने घर-घर पहुंचेंगे, तो उनका असली काम जनता की शिकायतों, अपेक्षाओं और सरकार के प्रति उनके रुख का डेटा जुटाना होगा. 13 प्रमुख कार्यक्रमों के जरिए पार्टी सीधे महिलाओं, युवाओं और लाभार्थियों की पंचायत से पार्लियामेंट तक की ट्यूनिंग को री-चेक करेगी. इस राष्ट्रव्यापी जनसंपर्क के माध्यम से जो भी फीडबैक मिलेगा, उसी के आधार पर पार्टी अपनी आगामी चुनावी रणनीतियों और टिकट वितरण के समीकरण तय करेगी यानी सेवा ही संगठन के इस बड़े नैरेटिव के सहारे भाजपा चुपचाप 2029 की अपनी जमीन को और भी ज्यादा पुख्ता और धारदार बनाने का प्रयास करेगी.

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