मुंबई। रतन टाटा के निधन के बाद उनकी विरासत से जुड़ा करीब 10 हजार करोड़ रुपये का एक बड़ा मामला अब चर्चा में है। मामला टाटा संस में रतन टाटा की करीब 0.83 फीसदी हिस्सेदारी से जुड़ा है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के 2 सितंबर के फैसले के बाद इस हिस्सेदारी के ट्रांसफर को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
दरअसल, इसकी जड़ करीब 37 साल पुरानी है। साल 1989 में नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट ने नवल टाटा को टाटा संस के शेयर ट्रांसफर किए थे। इस ट्रांसफर में एक शर्त रखी गई थी। शर्त थी कि नवल टाटा इन शेयरों को अपने जीवनकाल में किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं दे सकते थे। अगर शेयर ट्रांसफर करने हों, तो पत्नी या बच्चों को दिए जा सकते थे। और अहम बात ये थी कि ये शर्त आगे बच्चों पर भी लागू होनी थी। यानी मकसद था कि टाटा संस के शेयर टाटा परिवार के भीतर ही बने रहें।
अब पेंच रतन टाटा की वसीयत को लेकर है।
रतन टाटा ने अपनी वसीयत में टाटा संस की अपनी 0.83 फीसदी हिस्सेदारी दो चैरिटी संस्थाओं—रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट और रतन टाटा एंडोमेंट फाउंडेशन—के नाम कर दी। इसी पर सवाल है कि क्या नवल टाटा के समय लगाई गई पुरानी शर्त रतन टाटा की वसीयत पर भी लागू होती है?
महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के फैसले के मुताबिक, अगर पुरानी शर्त का उल्लंघन हुआ है, तो नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी उचित कदम उठा सकते हैं।
हालांकि कानूनी राय एक जैसी नहीं है। एक पक्ष का कहना है कि पुरानी शर्त के चलते रतन टाटा इन शेयरों को बाहर नहीं दे सकते थे। वहीं दूसरी राय में कहा गया है कि शेयर चैरिटी संस्थाओं को दिए गए हैं, किसी निजी बाहरी व्यक्ति को नहीं—इसलिए वसीयत को वैध माना जाना चाहिए।
अब नजर इस बात पर है कि नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी और रतन टाटा की वसीयत के एग्जीक्यूटर्स इस विवाद को कैसे सुलझाते हैं। यानी करीब 10 हजार करोड़ की हिस्सेदारी का सवाल सिर्फ रकम का नहीं… बल्कि पिता की पुरानी शर्त और बेटे की वसीयत के बीच कानूनी टकराव का है।
